शनिवार, 24 दिसंबर 2016

हर हर महादेव

दिसम्बर के महीनें में जब, सुबह-सुबह रजाई स्वर्ग का सुख देती हो ऐसे में गंगा स्नान के लिए घने कुहरे की परवाह किए बिना १३४ किलोमीटर बाइक से हरिद्वार के लिए निकलना किसी एडवेंचर ट्रिप से कम न था। दस कदम दूर कुछ नहीं दिखाई पड़ता था। रास्ता सूंघ कर आगे बढ़ना पड़ रहा था।


बाइक चला रहे थे वीरु भइया, बीच में बैठा था अंकित और सबसे पीछे मैं। ट्रिपलिंग सवारी करना गैर कानूनी है लेकिन जब ड्राइवर, वकील हो तो उसके लिए ये सोचने का विषय नहीं होता। कोई न कोई प्रावधान पुलिस को समझा कर बचा जा सकता है।
ख़ैर हम सब कभी हिमालय नहीं गए हैं लेकिन आज बाइक पर साइबेरिया वाली फ़ीलिंग आ रही थी।
रास्ते भर कांपते रहे, एक जगह रुक कर हाथ की भी सिंकाई हुई।
सूरज भगवान समय से निकले। तब लगा कि शायद हमारी भक्ति देखकर भावुक हो गए हैं भगवान।

करीब ९ बजे तक गंगा मां में हम सब डुबकी मार चुके थे। रास्ते की सारी थकान रफूचक्कर। गंगा मां की धवलता और चंचलता यहीं देखने को मिलती है।
नहाने के बाद शांति कुंज , हरिद्वार में गायत्री मां के दर्शन और फिर भंडारे में भरपेट स्वादिष्ट भोजन 😋
फिर क्या भजन-भोजन के बाद मौसी के पास आ गए। अंकित अपने रूम पर, भइया गाज़ियाबाद, और मैं ट्रेन 🚄 के जनरल डिब्बे में।

घर 🏠 जा रहा हूँ। IIMC में पढ़ाई का पहला सत्र समाप्त। १०दिन की छुट्टी मिली है। पहले मैं घर नहीं जाने वाला था लेकिन
अम्मा(दादी) का भावुक फ़ोन आया दो दिन पहले। ख़ुद को रोक नहीं पाया। मामा से बिना पूछे निकल आया एक्साइटमेंट में।
२ जनवरी से नया सत्र शुरू होगा। १ तक दिल्ली वापस आना है ।

अभी ट्रेन धीरे-धीरे रेंग रही है, दुआ कीजिए टाइम से लखनऊ पहुंच जाए।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

मन बावला है



मन बावला है, मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
मुझको ख़बर है कि
ख़्वाहिश हुई है
कुछ तो मोहब्बत सी
साज़िश हुई है
कोई है गुम-सुम
ख़्यालों मे ख़ुद के
लगता है चाहत की
बारिश हुई है...
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
उसने कहा कुछ
मैंने सुना कुछ
सपने मे उसने
शायद बुना कुछ
फिर भी है गुम-सुम
ख़ुद में ही खोई
मिल के भी मुझसे
क्यों न कहा कुछ??
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
अब तो मोहब्बत का
इज़हार कर दो
हो न मोहब्बत तो
इंकार कर दो
सब कुछ पता है
मासूम दिल को
ख़ुद को भी चाहत की
कुछ तो ख़बर दो।।
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
-अभिषेक शुक्ल

रविवार, 11 दिसंबर 2016

आभासी दुनिया के लड़ाके

भक्त भक्षकों और भक्त रक्षकों ने फेसबुक को नरक बना दिया है।दोनों ख़ुद को यमराज समझने लगे हैं।मौका मिलते ही दोनों एक-दूसरे पर ऐसे टूटते हैं कि जैसे बिना विरोधी मारे मोक्ष नहीं मिलेगा।
जो भक्षकों की विचारधारा का खंडन करे, उनसे असहमति जताए वो भक्त, संघी और अराजक है।
यही हाल रक्षकों का है। उनके नज़र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह है। आलोचक और आतंकवादी होना एक ही बात है।
दोनों प्रकार के लोग अपनी राहों से भटके हुए हैं।
उदारवादी लोग भी उतने ही अराजक और असभ्य हैं जितने कि इनके विरोधी रूढ़िवादी लोग।
वास्तव में दोनों विचारधाराओं के लोग अतिवादिता के मारे हुए लोग हैं।
इन दिनों स्वतंत्र चिंतन, विचार हीनता के धुंध में ओझल है। किसी को कहीं दिख जाए तो उसे ठीक पते पर पार्सल करना न भूलें। देश आपका आभारी रहेगा।

रविवार, 27 नवंबर 2016

परिवर्तन रैली के बहाने


प्रधानमंत्री ने कुशीनगर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि "हम भ्रष्टाचार और कालाधन बंद करने का काम कर रहे हैं, विपक्ष भारत बंद करने का।"
उनके कहने का आशय यह है कि
विपक्ष  उनके साथ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा है।
नोटबंदी जैसा बड़ा परिवर्तन लाने के बाद अब मोदी जी उत्तर प्रदेश में परिवर्तन यात्रा पर हैं।
वैसे भी सबसे ज्यादा परिवर्तन की जरूरत यहीं है।
देखने वाली बात ये होगी कि यूपी की जनता भाजपा के विरुद्ध बाक़ी पार्टियों के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करती है या अपने देश भक्ति के प्रमाण पत्र को रद्द होने से  बचाती है।
प्रधानमंत्री आधुनिक लेनिन हैं पूंजीपतियों को कंगाल करके मानेंगे। रैली में उन्होंने कहा कि मेरे  इस कदम से ग़रीबों को छोटी मुश्किल होगी और अमीरों को ज्यादा, लेकिन अगर आप अम्बानी या बिड़ला हैं तो "यू डोंट हैव टू वरी अबाउट इट।"
वैसे भी हमारे कानून में एक कहावत है कि " ए किंग कैन डू नो रोंग" अर्थात राजा कभी गलत नहीं कर सकता।
मित्रों! सिर्फ़ पचास दिन की बात है, अभी तो बीस ही दिन बचे हैं।
भाई साहब! बीस दिन में कचूमर निकल गया , तीस दिन में क्या-क्या होना बाकी है?
प्रधानमंत्री  ने कहा कि देश में आधे से ज्यादा लोग ऑनलाइन टिकट खरीद रहे हैं ।ऐसे में शायद कोई प्रधानमंत्री को ये बताने वाला नहीं है कि पाले काका या नकाही वाली काकी आनलाइन ट्रांजेक्सन नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनके पास न तो फोन है और न ही एटीएम कार्ड। अगर हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि वे निरक्षर हैं।
ऐसे ही देश की बड़ी आबादी निरक्षर है जिससे आनलाइन ट्रांजेक्सन करने की उम्मीद करना बेवकूफी है।
भारत गांवों में बसता है और वहां एटीएम की सुविधाएं तक नहीं है पेटिएम की क्या बात करें?
भुखमरी, गरीबी और बदनसीबी के दौर में भारत भले ही डिजिटल हो रहा हो पर एक बड़ी आबादी विकल है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री के अनुसार नोटबंदी सबसे उचित हथियार था देश के अंदर पांव पसारे काले धन के वध के लिए , इसे जनता ने स्वीकार किया है पर इसका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हुआ इसे प्रधानमंत्री जी को स्वीकार कर लेना चाहिए।
सत्तर साल के लूट की इनकम को मोदी जी गरीबों को स्कूल, गैस कनेक्शन, खेती के लिए ऋण, विकास आदि के कार्यों के रूप में जनता में बांट देंगे। अगर ये जुमला नहीं है तो ये स्वागत योग्य कदम है और अगर ये जुमला है तो सुन के खुश होने में क्या जाता है?
प्रधानमंत्री ने कहा कि कालाधन अब गोरा नहीं करने दिया जाएगा, भ्रष्टाचार के नकुना में नथेल कसी जाएगी।
ईमानदारी के यज्ञ में बेईमानी की समिधा पर भक्त जन यज्ञ कर उनकी पवित्र मंशा को पूरा करने के लिए सहयोग दें। यह राष्ट्रीय अपील है।
बिना पैसे के कारोबार जनता कैसे चलाए इस विषय पर विद्वानों से उन्होंने अपील की है कि जनता को डिजिटल ज्ञान सिखाएँ। जियो का सिम किस लिए लांच किया गया है।
गन्ना किसानों के खाते में सीधे पैसा दिया जाएगा जिससे उनके कर्ज़ की चुकाई बिना दलाली के हो जाए। योजना तो ठीक ही है, अगर ये खाली योजना ही न रहे तो।
प्रधानमंत्री ने पूरब को एम्स देकर काम ठीक किया है लेकिन जब ये बनकर तैयार हो तो "नेता पहले जनता बाद में" वाली व्यवस्था न रहे तब।
उन्होंने बताया कि किसानों को लिए सॉयल कार्ड बनाया है। ताकि उनकी जमीन का परीक्षण किया जा सके और उसके हिसाब से किसानी की जाए। ये काम अच्छा है इसके लिए उनका धन्यवाद।
फसलों की रक्षा करने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सरकार लेकर आई है अगर इससे जनता को लाभ मिलता है तो ये सरकार का साराहनीय काम है।
 प्रधानमंत्री की यूपी में ये तीसरी रैली है. आगरा और गाज़ीपुर में परिवर्तन यात्रा हो चुकी है। देखते हैं वहां क्या परिवर्तन आएंगे।
प्रधानमंत्री पहली एयर कंडिशन्ड हमसफ़र ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई जो गोरखपुर से दिल्ली तक चलेगी, इस ट्रेन का टिकट जिन यात्रियों को मिल जाएगा उन्हें भाग्यशाली समझा जाएगा।
और चलते -चलते
गोस्वामी जी की एक बात सभी पत्रकारों को याद कर लेनी चाहिए कि-
"सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥"
तो सच बोलिए , देशभक्ति तो तभी हो सकती है जब देश के भलाई के लिए सत्ता को विवश करते रहें । सरकार का काम ही है जनता के लिए अच्छी योजनाएं बनाना, उन्हें लागू कराना। लेकिन जब आपको लगे कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है तो कलम चलाइए, सच कहिए नहीं तो सत्ता को निरंकुश होते वक्त नहीं लगता।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

तुम अलग युग की कहानी

तुम अलग युग की कहानी
हम अलग युग की कथा हैं,
व्यक्त जिनको कर न पाए
मूकवत मन की व्यथा हैं ।।
तुम किसी मरुभूमि में से
मेघ का संधान हो क्या?
साधना की ही नहीं पर
ईश का वरदान हो क्या??
- अभिषेक

बुधवार, 9 नवंबर 2016

पापा! मुझे सब पढ़ेंगे।

पापा! मेरे नम्बर भले ही इस बार कम आए  हों लेकिन मुझे एक दिन मेरे सारे टीचर्स पढ़ेंगे। हरिराम आचार्य जी ने इस लेटर में जो मेरी शिकायत लिखी है न एक दिन मेरी बड़ाई करेंगे, तब मैं उन्हें बिलकुल भी भाव नहीं दूंगा।
पापा हमेशा की तरह मेरी बात पर मुस्कुराते हुए  आगे बढ़ जाते।
मुझे कभी नम्बर की वजह से डांट नहीं पड़ी। भइया थोड़े परेशान हो जाते थे इस बात पर। उन्हें लगता कहीं मैं औरों से कमजोर न पड़ जाऊँ।
ख़ैर थोड़ा बड़ा हुआ तो सब ठीक हो गया। पढ़ने वाले विषयों को कंठस्थ कर लेता। सारे विषयों के सैद्धांतिक पक्ष कंठस्थ रहते तो सहपाठियों को लगता बहुत पढ़ाकू हूं।मैं भी भरपूर ज्ञान बांटने में कोई विलंब नहीं करता, सबको शिक्षा बांटता।
ख़ैर मुझे पता था कि मुझे कुछ नहीं पता है।
बचपन में हरिराम आचार्य जी पता नहीं क्यों महीने में दो चार बार शिकायती पत्र लिख कर पापा के नाम भेज देते और मुझसे कहते हस्ताक्षर करा के लाओ। वो सोचते घर पे कुटाई होगी मेरी पर उनकी मंशा पर घर वाले पानी फेर देते।पढ़ाई को लेकर कभी कूटा नहीं गया।
स्कूल से ज़्यादा भइया ने मुझे पढ़ाया। गणित को छोड़कर सारे विषय मेरे ठीक-ठाक थे, भइया ने बेइज्जती न होने भर का गणित सिखा दिया था, जब कॅापी चेक होती तो पिटाई से बच जाता, बहुत दिनों तक इतना ही रिश्ता रहा मेरा गणित से।ग्यारहवीं में तो मैंने तलाक ही ले लिया गणित से। फिर कानून की पढ़ाई और अब पत्रकारिता की।
यकीन ही नहीं होता इन लम्हों को गुजरे हुए एक वक्त बीत गया।
मेरा साहित्य अब किशोर हो रहा है। टूटा-फूटा ही सही पर लिखते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया। लिखना आज भी नहीं आया।
आज मैंने पुरानी डायरियों को खोज निकाला। एक अटैची में सुरक्षित रखी हुईं मिलीं। बचपन आंखों के सामने तैरता हुआ नज़र आया। बीते कल को महसूस किया।
तब भाषाई अशु्द्धियां अधिक थीं पर  भावनाएं निश्छल थीं। कृत्रिम व्याकरण का आवरण तब नहीं ओढ़ा था रचनाओं नें।
कितने ख़ूबसूरत दिन थे न? नहीं! मेरा आज भी बहुत खूबसूरत है।
मामा कहते हैं जिस पल में हम जीते हैं वही हमारे जीवन का सबसे सुनहरा पल होता है। जो बीत रहा है वो कभी नहीं आएगा।
इतने दिनों में अब तक अपना वादा नहीं पूरा कर पाया। पता नहीं मेरा कुछ लिखा हुआ मेरे गुरुजनों ने पढ़ा होगा या नहीं, ये भी नहीं पता कि मेरा वादा पापा को याद है या नहीं, पर लिखना थमा नहीं है। मुझे कितना वक्त लगेगा पापा से किया गया वादा पूरा करने में, नहीं जानता लेकिन जाने क्यों उन बातों के याद आने भर से ही मेरे हाथ कलम की ओर बढ़ जाते हैं और फिर मैं लिखने बैठ जाता हूँ कुछ कहे-अनकहे शब्द....उसी एक वादे के लिए।।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

वो सच नहीं है।

मैं आपसे कभी बात नहीं करुंगी। हमेशा फोन मैं करती हूँ आप भूल कर भी कभी कॅाल नहीं करते हो। हर बार बिज़ी होने का बहाना होता है, हर बार मैं पूछती भी हूँ बिज़ी हो? आपका फिर वही रटा-रटाया जवाब नहीं! तुम्हारे लिए नहीं। 
आप सच में मुझे कभी याद करते हैं? कुछ वजूद है मेरा आपके लाइफ में?
अब तो हद हो गई। पिछले दस दिनों से आपने बात नहीं की। न फेसबुक न व्हाट्सप न स्टीकर्स, क्या हुआ है आपको? 
कोई और है क्या आपकी ज़िन्दगी में? 
मुझसे मन भर गया? क्यों खेल रहे हो मेरे जज्बातों के साथ? ख़त्म क्यों नहीं कर देते सब कुछ?
ख़ैर! इस रिलेशनशिप में तो मैं हमेशा अकेली ही थी, कभी आपकी साइड से कुछ था ही नहीं। प्यार नहीं! दोस्ती या कुछ दोस्ती से ज़्यादा? 


सुनो मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।कोई हो आपकी लाइफ में तो प्लीज़ बता देना मैं भूलकर भी याद नहीं करुंगी आपको। वैसे भी मेरे पास खुद के लिए वक्त कम है। मेरी शादी हो ही जाएगी कुछ दिनों में। कोई अजनबी ज़िंदगी भर के लिए मेरी किस्मत में मढ़ दिया जाएगा।जबरदस्ती का रिश्ता निभाना है मुझे उम्र भर के लिए। किसी ब्लैक एंड व्हाइट सेट के साथ मुझे ढकेल दिया जाएगा किसी कोने में हमेशा के लिए। मेरी सारी डिग्रियां मेरी ही तरह सड़ेंगी किसी कोने में। 
आप तब तक फेमस हो जाओगे। टीवी पर भी आप दिखोगे पर मैं चैनल बदल दूंगी।आपको कभी पलट कर नहीं देखूंगी। आपकी किताबें कभी नहीं पढ़ूगीं।अख़बारों में भी आपके आर्टिकल्स नहीं पढ़ूंगी।
आपको सब चाहते हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं है, बहुत अकेली हूं मैं।आपसे बात करना चाहती हूँ पर आप बात तक नहीं करते।
आप मेरे साथ ऐसा करते हैं या सबके साथ?
लाइब्रेरी, क्लास, पढ़ने और लिखने के अलावा कुछ करते हैं आप?
कभी तो फ्री होते होंगे तब मुझसे बात क्यों नहीं करते? आई लव यू हद से ज्यादा। सॅारी आज मैंने आपको कुछ ज्यादा सुना दिया। मैं बहुत बुरी हूं हर बार आपको परेशान करती हूँ पर अब नहीं करूंगी। गुड बॅाय!
क्या हुआ? सॅारी यार! नेटवर्क नहीं है यहाँ। और अब तुम मेरे रिसेंट कॅाल लिस्ट में नहीं हो। मैंने सेट फार्मेट किया था तुम्हारा नंबर मिट गया। कहीं और नोट भी नहीं है।
तुम ऐसे क्यों कह रही हो? मैं ऐसा ही तो हूं।मुझे मां से बात किये हुए कई दिन बीत जाते हैं। मेरे सारे दोस्त मुझसे इसी वजह से नाराज ही रहते हैं। मैं किसी से बात नहीं करता।शायद फोन पे बात करना अच्छा नहीं लगता मुझे।
तुम कभी-कभी अजीब सी बातें क्यों करती हो? तुम सेल्फ डिपेन्डेंट हो, अच्छी सैलरी मिलती है। बालिग़ हो तो तुम क्यों किसी के साथ जबरदस्ती ब्याही जाओगी। मना कर देना सबको जब तक तुम्हारे पसंद का लड़का तुम्हें न मिले।
पसंद की तो बात मत करो आप।पसंद तो सिर्फ आप हो मुझे , मुझसे शादी करोगे?
यार प्लीज़! कोई और बात करें? जानती हो मैंने एक नयी कविता लिखी है सुनोगी?
रहने दो, ज़िन्दगी कविता हो गयी है अब कविताओं से चिढ़ होती है। कभी तो सीधा जवाब दे दिया करो..सॅारी यार! मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकता, मैं खुद के भी साथ नहीं हूं, किसी अनजान से रास्ते की ओर कदम बढ़ते चले जा रहे हैं। वक्त धीरे-धीरे मुझे मुझसे दूर करता जा रहा है। ऐसे में मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं दे सकता।
किसने कहा मुझे आपसे कोई उम्मीद है? अब इतना तो आपको समझ ही चुकी हूं। 
एक्चुअली जानते हैं आपकी प्रॅाब्लम क्या है?
आप न कभी किसी रिलेशनशिप को हां सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकि आपके साथ जो गुड ब्वाय वाला टैग लगा है न उसे खोने से डरते हैं। तभी शायद आपकी कोई गर्लफ्रैंड कभी थी नहीं न होगी,
बहुत मुश्किल से खुद को सम्हालती हूं । कोई इमोशन नाम की चीज़ है आपके दिल में?
ऐसा कुछ नहीं है....
बॅाय! अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी।
सुनो!
कहो!
जो तुम कह रही हो वो सच नहीं है।
तो सच क्या है?
कुछ नहीं। 'ब्रम्ह सत्यम् जगत मिथ्या'। 
बॅाय! अलविदा। 
रुको!
नहीं अब कोई फायदा नहीं है ......
कॅाल डिस्कनेक्टेड....
कॅाल रिजेक्टेड....काश! मुझे आज सुन लेती....कुछ बताना था..लेकिन क्या बताना था....मुझे क्या पता...तब की तब देखते।
- अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

ईश का वरदान हो क्या?




सुन रहा हूँ आहटों को
 नींद आंखों से परे है,
सिसकियां दर्शन में उतरीं
 मौन होठों को धरे है,
इस अलग रणक्षेत्र में तुम
 काव्य का आह्वान हो क्या?
साधना की ही नहीं पर
 ईश का वरदान हो क्या??

रविवार, 23 अक्तूबर 2016

शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन


शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन,
चिमनी भट्टी,शोर-शराबा कैंटीन में चौका बरतन ।।
दिनभर सारा काम करुं तो खाने भर को मिलजाता है,
कुछ पैसे मैं रख लेता हूँ कुछ मेरे घर भी जाता है।।
फटे हुए कपड़े मुन्नी के मां को नहीं दवाई मिलती
अपना भी तन मैं ढक पाऊँ इतनी कहाँ कमाई मिलती?
दिन-रात मैं मेहनत करता फिर भी पैसों की है तरसन,
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन।।

-अभिषेक

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

दशहरा, स्मृतियों के कोने से।

काश! ऐसा मुमकिन होता कि वैज्ञानिक कोई ऐसा टाइम मशीन बनाने में सफल हो जाते जिसमें बैठकर मैं अपने बचपन में पहुंच जाता। तब, जब मैं घर में खूब उत्पात मचाता था।उस वक़्त जब मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था। उस वक़्त जब दशहरे की छुट्टी दशहरे से चार-पांच दिन पहले ही हो जाती थी और हम लोग इन छुट्टियों में खूब मस्ती करते थे।
दशहरा का मेला नवरात्र के पहले दिन से ही शुरू हो जाता था। मेला शोहरतगढ़ में लगता था।
मैं मनाता था हे भगवान! जल्दी से छुट्टियां हो जाएं और हमें मेला देखने को मिले।
पहले जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे दिन में मेला दिखाने पाले काका ले जाते थे। काका पूरा मेला घुमाते थे। समोसा,जलेबी और खुरमा खिलाना फिक्स था। इसके बाद कोई एक खिलौना। काका से डर भी लगता था कोई डांट ना पड़ जाए कुछ जिद करने पे। सो जो मिलता बिना ना-नुकुर किये रख लेते थे। काका की उम्र ढली तो काका भीड़-भाड़ से परहेज़ करने लगे।
काका की जिम्मेदारी जब तक छूटी तब तक भइया बड़े हो गए थे। मैं भी ज्यादा चलने पर रोता नहीं था। पहले अम्मा केवल एक दिन मेला देखने देती थी लेकिन भइया के साथ ३दिन मेला घूमने की आजादी मिल जाती थी। शाम को कुछ खाकर भइया और मैं मेला देखने निकल जाते थे। शोहरतगढ़ तक पैदल जाना होता था। हम लोग अकेले ही नहीं जाते थे, पूरा गांव साथ जाता था।
खर्च करने को पैसा भी खूब मिलता।पहले दिन अम्मा से मिलता, दूसरे दिन मम्मी से मगर  एकमुश्त अच्छी-खासी रकम पापा ही देते थे।
भइया के साथ मेला घूमने का मतलब होता था मस्ती की लॅाटरी लगना। मतलब भरपेट जीभ की सेवा और खिलौनों से भी थैली भरी रहती।
भइया से कभी  रिमोट वाली कार की जिद करता तो कभी मैगजीन वाले पिस्टल की। कभी बड़ी सी प्लास्टिक वाली ए.के४७ तो कभी पटाखे वाले राइफल की।
इतने से मन थोड़े ही भरता था मेरा, अगले दिन नए खिलौनों की लिस्ट। मेरे पास अटैची भर के खिलौने रहते थे। भइया के पास जब कभी कुछ पैसे जमा हो जाते थे मेरे लिए खिलौने खरीद लाते थे।
वीडियो गेम, वाकमैन तो हर दो महीने खराब होता और नया मिलता।साल भर तक मैं खिलौना इकट्ठा करता और गर्मी की छुट्टी में सबको बांट देता।
मुझे खिलौनों से इतना प्यार था कि मम्मी जब कहीं पापा के साथ घूमने जाती थीं और मैं उनके साथ नहीं जा पाता था तो मेरे लिए घूस में खिलौना लाती थीं। बारहवीं तक मेरे पास खूब सारे खिलौने थे पर मेरठ जाने के बाद अचानक से एहसास हुआ कि अब मैं थोड़ा बड़ा हो गया हूँ।
सच कहूं तो ये खिलौने तभी तक अच्छे लगे जब तक भइया घर पर थे।भइया बाहर पढ़ने चले गए तो मेला छूट गया। हर बार इंतजार करता की भइया इस बार दशहरा की छुट्टी में घर आएंगे पर पूर्वी उत्तरप्रदेश में दशहरे की केवल एक दिन की छुट्टी होती। मेरा मन मेला देखने का करता ही नहीं तब। भला भइया बिना कोई मेला देखने की चीज़ होती है क्या?
जब मैं दसवीं में था तब भइया बाहर पढ़ने चले गए थे।मेला तब भी लगता था लेकिन मैं जाने से कतराता था। पता नहीं क्यों मेले के नाम से रुलाई छूट पड़ती।
कई बार उपेन्द्र जबरदस्ती ले जाता था। इमोशनल ड्रामा आज भी वो टॅाप क्लास का करता है।
इंटरमीडियट कम्प्लीट हुआ तो मेरठ पढ़ने आ गया। अजनबी शहर तो हर पल मेला लगता है।
( यहां नौचंदी मेला लगता है जिसमें हम भाई-बहन सब साथ में जाते थे..इसके बारे में फिर कभी लिखूंगा)
यहां कब नवरात्र लगता कब बीत जाता कुछ पता ही नहीं चलता था। दशहरे वाले दिन मेरठ में कंकड़खेरा में मेला लगता है। रावण का पुतला फूंका जाता है। यहां मेला दिखाने के लिए वीरु भइया थे। इस मेले में हम केवल धूलयुक्त गोलगप्पे खाते थे, फिर मीठा पान खाते थे।
दूसरे साल से राजेश भइया मिल गए, फिर अशोक भइया।चौथे साल तक तो पूरी फौज ही इकट्ठी हो गई थी। अंशू,अंकित और मनीष भी आ गए थे। मेरठ में आखिरी दशहरा याद है धमाकेदार मना था। मेले से लौटकर जब हमारी टोली वापस आई तो न जाने कैसे माइकल जैक्सन की आत्मा राजेश भइया में घुस गई थी। कभी लेट के तो कभी नागिन डांस तो कभी चारो तरफ से नाचते। अंशू और अशोक भाई भी रंग में थे लेकिन राजेश भइया के सामने कोई टिक ही नहीं पा रहा था।

आज दशहरा है लेकिन आज फिर मैं मेला नहीं गया, आज वीरु भइया भी साथ नहीं थे। न जाने क्यों इस बार दशहरा बहुत खला।
सच कहूं तो बिना भाई-बहनों के कोई उत्सव, उत्सवमय लगता है क्या। जाने क्यों वही पुराने दिन याद आ रहे हैं। भइया के हाथों को पकड़े,नहर के किनारे वाली सड़क पर धीरे-धीरे चलना और भइया से कहानियां सुनते-सुनते घर तक पहुंच जाना..अम्मा का दरवाजा खोलना, उसे चहक कर नए खरीदे हुए खिलौने दिखाना,हफ्तों अपने खिलौनों पर इतराना....वो भी क्या दिन थे।
हर बार की तरह इस बार भी  दुकानें सजी होंगी।पल्टन के पल्टन पैदल ही लोग शोहरतगढ़ की ओर जा रहे होंगे। बूढ़े-बुजुर्ग सब तैयार होकर गांव से निकल गये होंगे।भौजाईयां सातो सिंगार कर के मेला की ओर बढ़ चुकी होंगी।मजनूँ बेचारा फिर पिटा होगा।पल्टहिया भौजी फिर उसे ५०रुपए मेला करने के लिए दी होगी। भला दस रुपए में क्या मिलता है? ढंग का खिलौना भी नहीं मिलता इतने में। जलेबी, समोसा तो पूछो ही मत।सबके भाव आसमान पर छाए रहते हैं मेले में,
लेकिन कौन समझाए भौजाई को हर मेले में बेचारा कूटा जाता है......मैं भी यहां खुद को कूट रहा हूँ, कुछ पुरानी स्मृतियों को, बीती कहानियों को..उकेर रहा हूँ यादों के कैनवास पर भावों की तूलिका से , शनैः-शनैः।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

नेह का सागर लाई नानी

अंतरिक्ष को पात्र बनाकर नेह का सागर लाई नानी
जिसमें सारी दुनिया तर हो वैसी ही गहराई नानी,

हमको हर-पल यही लगा की पग पग पर है साथ हमारे
कई दिनों से ढूंढ रहे हैं जाने कहाँ हेराई नानी?

आँखों में जब आँसू आते झट से विह्वल हो जाती थी
अब रो-रो कर बुरा हाल है कैसे हुई पराई नानी?



पल-पल क्षिन-क्षिन उन्हीं कहानी किस्सों की सुधि आती है
सावन की भीनी रातों में जिनको कभी सुनाई नानी,
सच है की नानी की गोदी गंगा से भी शीतल लगती
तभी हमें ये अक्सर लगता सब नदियों की माई नानी,
जब-जब नानी याद आती है आँखों से आँसू झरते हैं,
ऐसे छिपकर गुम होने की कैसी जुगत लगाई नानी?

-अभिषेक शुक्ल 

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

''आज़ादी और आदिवासी''-अमरेंद्र किशोर

बीते सप्ताह एक किताब हाथ लगी ''आज़ादी और आदिवासी''।
इस किताब के लेखक हैं पत्रकार अमरेंद्र किशोर। प्रकृति पुत्रों की बनैली संस्कृति और उनके भाग्य में मढ़ी गयी विसंगति तथा समाज के साथ उनके संघर्ष पर अब तक लिखी गई सबसे सटीक किताबों में से एक किताब आज़ादी और आदिवासी भी है।
आम तौर पर जब हम आंकड़े इकट्ठा करने के लिए कोई किताब पढ़ते हैं तो अपने काम का विषय पढ़ कर किताब वापस लाइब्रेरी में रख देते हैं, ऐसे ही मंशा लिए मैं भी पढ़ने गया था पर एक लाइन ने पूरी किताब पढ़ा डाली मुझसे।
वो लाइन थी-
''कोई भी समूह जब अपने मूल से कटता है तो कई प्रकार की विसंगतियां उसके भाग्य में मढ़ जाती हैं।'' ये सच है।
हर समुदाय का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है जिसमें किसी भी प्रकार का बाह्य हस्तक्षेप करने का अर्थ होता है उस समुदाय की मान्यताओं को ठेस पहुँचाना। कई बार हस्तक्षेप इतना घातक होता है कि लोग विद्रोह कर देते हैं समाज के प्रति|यह विद्रोह इतना घातक होता है कि समाज सशस्त्र क्रांति की ओर बढ़ जाता है। विद्रोह धीरे-धीरे वाद में बदल जाता है और फिर उस वाद का नामकरण कर दिया जाता है, जैसे - नक्सलवाद, माओवाद, जंगलवाद।
फिर शुरू होता है राज्य का अत्याचार उस समाज पर कालांतर में राज्य और समुदाय एक-दुसरे से उलझते रहते हैं.


जंगल कटते जा रहे हैं और इन जंगलों में रहने वाले आदिवासी भी अपने जड़ों से कटते जा रहे हैं, जिस के कारण एक बड़ा तबका असन्तुष्ट है।
सरकार से असंतुष्ट लोगों को विद्रोही बनाना सबसे आसान काम होता है, उनके इसी मनः स्थिति का लाभ उठाने में चालाकी दिखाई नक्सलवादी संगठनों ने।
आदिवासी समाज का अस्तित्व जंगलों से है। आदिवासियों की संस्कृति निराली होती है, इतनी निराली जो शायद समाज के समझ में न आये।
आज़ादी मिलने से पहले आदिवासी अपने मूल स्वभाव में थे, यानी ब्रिटिश इंडिया से कटा-छटा। ब्रिटिश इंडिया में इनकी मूल स्थिति पर कभी प्रहार नहीं किया गया था। जंगलों से उनका रिश्ता भी शिकार तक सीमित रहा।
आज़ादी के उपलक्ष्य में जब पूरे भारत में जश्न मनाया जा रहा था तो आदिवासियों ने भी जश्न मनाया होगा। कुछ उम्मीदें भी रही होंगी , कुछ प्रत्याशाएं भी पर जैसे-जैसे समय बीतता गया उनकी उम्मीदें टूटने लगीं। सरकारों को जंगल काटने से मतलब था ,कच्चा माल लूटने से मतलब था आदिवासियों से नहीं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने पाँव पसारे। जंगल काटे जाने लगे, पहाड़ तोड़े जाने लगे।
आदिवासियों का वनों से एकाधिकार समाप्त होता गया और लालची दुनिया जंगलों में पांव पसारती गई। आदिवासियों और वनों की सुरक्षा के लिए सरकारों ने लाख कानून बनाये, पर वे इतने प्रभावी कभी नहीं रहे जो इन्हें सुरक्षा दे सकें।
जब सभ्य समाज असभ्यों के अरण्य में जाता है तो प्रलय मचता है। सफेदपोश लोगों ने जब जंगल की ओर रुख किया तो उनके काले कारनामों से वनपुत्रियां नहीं बच सकीं। बलात्कार से लेकर वेश्यावृत्ति तक सारी कुरीतियां जंगलों में आ गयीं।आदिवासियों का व्यक्तिगत जीवन कब सार्वजनिक हुआ ये उन्हे भी नहीं पता चला।दुनिया भर के फोटोग्राफर जंगलों में पहुँच गए। आदिवासियों के अंतरंग पल दुनिया भर की मैगज़ीनों में फीचर होने लगे।
बाजारवाद की एक महत्वपूर्ण शर्त होती है कि संसाधनों का अधिकतम दोहन करो। ये दोहन चलता रहा।कभी कुछ पैसे देकर तो कभी जबरदस्ती।
आदिवासियों का दैहिक, आर्थिक और मानसिक शोषण अब तक हो रहा है।सब जानते हैं उनकी संस्कृतियां नष्ट हो रही हैं, उत्पीड़न हो रहा है। ऐसे में कुछ मौका परस्त लोगों ने उनकी असंतुष्टि को खूब भुनाया है।
वैसे भी पीड़ित लोगों को बरगलाना सबसे आसान काम होता है। सरकार के खिलाफ हथियार पकड़ा दिए गए ,कुछ ने हथियार उठा लिए , कुछ ने मूक समर्थन दे दिया। नक्सली योद्धा तैयार हो गए।
भूखे इंसान का केवल एक मज़हब होता है भूख। भर पेट खाना जो दे वही देवता अच्छा। धर्मान्तरण के सबसे ज्यादा मामले आदिवासी क्षेत्रों से आते हैं। विदेशों से संचालित ईसाई मिशनरियां ईश्वर का डर दिखा कर आदिवासियों को शिवप्रसाद से शिवा अलेक्जेंडर बनाती हैं। लालच देकर धर्म परिवर्तन।नेता जैसे चुनावी वादे करते हैं वैसे ही ये मिशनरियां समृद्धि के सपने दिखाकर धर्मान्तरण कराती हैं.
आदिवासी विसंगतियों में जीते हैं. न अस्पताल हैं, न स्कूल हैं, न रोज़गार न सर पे छत। ऐसे में सरकार से इन्हें प्यार भी कैसे हो? सरकार जब कुछ करने जाती है नक्सलियों के सरगना विकास की धज़्ज़ियाँ उड़ा देते हैं।
जंगल काटे जा रहे हैं।, जमीन छीनी जा रही है , विद्रोह तो होगा ही, आग तो सुलगनी ही है।
अमरेंद्र किशोर जी ने सरल शब्दों में आदिवासियों की व्यथा लिखी है, बरबस मन पसीज जाता है। आदिवासी महिलाओं की दशा पढ़कर वितृष्णा होने लगती है तथाकथित सभ्य समाज से। लूटने ,खसोटने के अलावा समाज कुछ नहीं समझता उन्हें।बड़े वर्गों के लिए ये महिलाएं शोषण की विषय वस्तु हैं.
लाल सलाम ठोंकने वाले कार्ल मार्क्स के उत्तराधिकारियों को ज़मीन पे उतरकर कभी जंगल की हकीकत जाननी चाहिए। राजनीती की रोटी सेंकने से अच्छा है कभी उनसे मिला जाए जिन्हें रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिनके नाम पे राजनीति करके इनकी रातें रंगीन होती हैं कभी उनकी व्यथा महसूस करें, लेकिन कितने शर्म की बात है कि जो पूंजीवाद के सबसे बड़े विरोधी लोग हैं वही निचले तबके को पूँजी के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते, उनके साथ खड़े होने का दावा तो करते हैं पर सिर्फ दावा ही करते हैं , उनके लिए काम नहीं करते ।
आप भी पढ़िए इस किताब को.ज़मीन,जंगल और रोटी को लेकर आदिवासियों अन्तर्द्वन्द्व को जानने के लिए ,शायद आप भी उस दर्द को महसूस कर सकें जिसे एक वर्ग दशकों से झेल रहा है ।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

झोपड़ियों में बिखरता बचपन

शहर के तंग गलियों में टूटे हुए सपनों की एक लंबी कहानी है. एक अज़ीब सी कुंठा में लोग जीते हैं.कभी कई दिन भूखा रह जाने की कुंठा तो कभी दिहाड़ी न मिलने की कुंठा, कभी सभ्य समाज की गाली तो कभी दिन भर की कमाई को फूंकने से रोकने के लिए शराबी पति की मार, कभी पति का पत्नी को जुए में हार जाना तो कभी बच्चों का नशे की लत में डूब जाना. ये हालात किसी फिल्म की पटकथा नहीं हैं बल्कि सच्चाई है उन झुग्गी-झोपड़ियों की जहाँ हम जाने से कतराते हैं.
इन गलियों की तलाश में निकलने से पहले मैंने बस कहानियां पढ़ी थीं इनके बारे में . नज़दीक से कुछ देखा नहीं था.जब पास गया तो महसूस हुआ कि आज़ाद हुए भले ही दशकों बीत गए हों पर इनके हालात न तब बदले थे न अब बदले हैं. न जमीन का ठिकाना न आसमान का.सिर्फ इनकी ही नहीं इनके पूर्वजों की भी जिन्हें गुज़रे एक जमाना हो गया. आज यहाँ तो कल वहां .भटकना अब आदत सी बन गयी है…
कटी-फटी झोपड़ पट्टियां, बरसाती से तनी झोपड़ियों में रहने वाले लोग जिनका ठिकाना शायद उन्हें भी मालूम नहीं है.इनकी तरह इनके काम का भी कोई ठिकाना नहीं है. कभी कच्ची शराब तो कभी कचरे की तलाश , कभी भांग तो कभी गांजे की तस्करी..दिन भर रिक्शा चलाना तो शाम को पौवा चढ़ाना..हाँ! शायद ये तकलीफें कम करने का कोई सस्ता सा जुगाड़ लगता है इन्हें.कुछ ऐसी ही कहानियां हैं इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों की.
इनका आज जैसा है, कल भी वैसा ही रहेगा…क्योंकि इनकी गणना ही नहीं होती हमारे सभ्य समाज में, अपने-अपने स्वार्थ साधने में लगे लोगों को इतनी फुरसत कब है कि इनकी सुधि लें.
टहलते-टहलते कुछ बच्चे भी मिल गए. चॉकलेट-बिस्कुट देख कर सब दौड़े चले आये.फटे कपडे, किसी के पैर में चप्पल तो कोई नंगे पावं, ऐसे झपटे जैसे जन्मों से भूखे हों.मैंने एक से पूछा कि पढ़ने जाते हो? तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि नहीं..मैं तो पैसे मांगने जाता हूँ. मैंने पूछा कि स्कूल क्यों नहीं जाते तो उसने कहा कि स्कूल जाऊँगा तो बापू मारेगा.
गोलू,मोलू,चिनकू,छोटू और न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं जो कभी स्कूल नहीं जाते…इनकी पाठशाला शुरू होती है सड़क पर और ख़त्म भी वहीं होती है, बस इनके हिस्से इतवार नहीं आता.
जब भी कोई अजनबी मिलता है तो कहते हैं- भैया! भूख लगी है. कुछ खाने को दो.इनका पेट हमेशा खाली रहता है . कुछ खाने को दो तो भी पैसा मांगते हैं. पैसा मांगने की एक वजह ये भी है कि ये अपने मां-बाप के कमाई की मशीन हैं. ये बच्चे कभी किसी गैंग का शिकार बनते हैं तो कभी खुद का गैंग बनाते हैं. इनकी आँखों में न तो स्कूल के सपने हैं न ये स्कूल जाना चाहते हैं.
छः से आठ वर्ष तक की उम्र पूरी करते-करते इन्हें बीड़ी, सिगरेट, शराब या भांग की लत लग चुकी होती है…उम्र बढ़ती है तो साथ-साथ नशे की लत भी और हावी होती चली जाती है…फिर ये सिलसिला तब-तक नहीं थमता जब तक की मौत न हो जाए.
हम आधुनिक हो रहे हैं. वास्तविक दुनिया के सापेक्ष हमने एक आभासी दुनिया भी बना ली है.फिर भी हमारे समाज में ही एक बड़ी आबादी ऐसी जिंदगी जीती है.जीवन की अपरिहार्य आवश्यकताएं भी पूरी नहीं होतीं.रोटी के लिए रोज़ लड़ना पड़ता है,औरतों की सिसकियाँ..भूखे बच्चों का रोना..बीमारी से मरते हुए लोग..तिल-तिल मरते ख़्वाब..चैन से सोने नहीं देते.ऐसे में कई बार लगता है कि ये डिज़िटल इंडिया, वर्चुअल वर्ल्ड , इनक्रेडिबल इंडिया , मेक इन इंडिया के स्लोगन बेईमानी हैं समाज से…ये कैसा समाज है जहाँ समता नहीं है?
हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन जरूर आएगा जब परिस्थितियां बदलेंगी। जब सबका अपना घर होगा, जब कोई भूखा नहीं सोयेगा, जब सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी होंगी…
पर कब तक? शायद ये भागवान को भी नहीं पता होगा….

-अभिषेक शुक्ल
भारतीय जनसंचार संसथान
नई दिल्ली। 

रविवार, 18 सितंबर 2016

धिक! धिक! जन-गण-मन नायक!

हा! भारत! हा! जन-गण-मन!
क्यों दग्ध ह्रदय को लिए फिरे?
क्या प्रत्यंचाएं टूट गईं
या गाण्डीव रह गए धरे?
धिक! धिक! जन गण मन नायक!
क्यों पुनः यही आभास हुआ
होकर मदान्ध तुम नहुष हुए
फिर भारत का उपहास हुआ।।
क्यों शर फिर सीना तान रहा?
क्यों सिमटा मेरा वितान रहा?
क्यों सहानुभूति उपजे मन में
जिन पर वर्षों अभिमान रहा?
छोड़ो दुख का जाप्य जयद
लेकर निषंग रण में उतरो,
जो विपदाएँ आएं पथ में
बन महादेव कण-कण कुतरो।

-अभिषेक शुक्ल
क्रमशः

सोमवार, 12 सितंबर 2016

जीत लो जग का निश्छल प्यार

नयन में उतर रहे कुछ स्वप्न
सार जिनका मुझसे अनभिज्ञ
आज और कल की ऊहापोह
अब कहाँ रहा मेरा मन विज्ञ ?


कई युग बीत गए हैं मित्र
यथावत रहा कहाँ संसार,
नित्य परिभाषाएं बदलीं
हुआ केवल मन का अभिसार.


यही है जीवित मन की शक्ति
यही मानव मन का उद्गार,
एक ही कर्म मनुज के योग्य
जीत लो जग का निश्छल प्यार .
-अभिषेक शुक्ल

सोमवार, 5 सितंबर 2016

अंगिका भाषा और आभासी दुनिया

लोक भाषाएँ लोक संस्कृतिओं की संवाहक होती है.विभिन्न प्रकार की लोक भाषाएँ और लोक संस्कृतियां भारत की विभिन्नता में एकरूपता की अवधारणा को पुष्ट करती हैं.भारत की यही विशिष्टता है विभिन्नता में एकरूपता.इन्हीं लोक भाषाओँ में एक सुमुधर और चिर पुरातन भाषा है अंगिका.

अंगिका भाषा से मेरा परिचय अभी कुछ समय पूर्व ही हुआ है.मैं इस भाषा की विशिष्टता से अनभिज्ञ था. इसका एकमात्र कारण यह था कि अंगिका भाषा मैथिली भाषा के सामान ही प्रतीत होती है.दोनों भाषाओं में विभेद करना केवल उन्ही के सामर्थ्य की बात है जो या तो भाषाविद हैं अथवा जिनकी ये मातृ भाषा है.
आज के युग में हर भाषा अपनी विशिष्टता खो रही है. उदाहरणार्थ अवधी और भोजपुरी को ही देख लीजिए.अवधी कबीर, रहीम और तुलसी दास जी की भाषा रही है. एक से बढ़कर एक ग्रन्थ और दोहे इसमें रचे गए हैं.भारतीय जनमानस का सबसे प्रसिद्द ग्रन्थ “श्री राम चरित मानस ” भी अवधी में ही लिखा गया है.शायद ही कोई सनातन धर्मी हो जिसके घर में रामचरित मानस न मिले, किन्तु यह जिस भाषा में है उस भाषा को लोग भोजपुरी समझने लगे हैं. भोजपुरी हावी हो रही है अवधी पर क्योंकि उसे स्तरीय साहित्यकार नहीं मिल रहे हैं.संयोग से अंगिका भी इसी स्थिति से गुजर रही है.
अंगिका अंग प्रदेश की भाषा है. वही अंगराज कर्ण की भूमि.अंग प्रदेश सदैव से प्रासंगिक रहा है चाहे महाभारत काल की बात हो अथवा बुद्ध काल की। यह प्रदेश सदैव भारत राष्ट्र का गौरव रहा है, किन्तु यहाँ बोली जाने वाली भाषा अंगिका अपने अस्तित्त्व से संघर्ष कर रही है.
यूनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने तो इसे विलुप्त भाषाओं में चिन्हित किया है,इसका कारण एक मात्र यही है कि इस भाषा को अच्छे सृजक नहीं मिले.
अंगिका भाषा मिठास की भाषा है, ऐसी भाषा जो बहुत आसानी से सीखी जा सकती है.यूँ तो किसी भाषा का उत्थान या पतन उस भाषा को बोलने वालों की सामरिक आर्थिक,सामाजिक और वैयक्तिक क्षमता पर निर्भर करती है किन्तु कई बार कुछ समर्थ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो इन सभी परिस्थितियों की अभाव में भी अपनी भाषा और संस्कृति को आगे ले जा सकते हैं.
ऐसे ही कुछ समर्थ साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ जो अंगिका भाषा के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं.
आज बौद्धिक वर्ग एक ही दुनिया में दो तरह की दुनिया में खुद को जीता है. एक वास्तविक दुनिया और दूसरी आभासी दुनिया.
आभासी दुनिया अर्थात फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉग वाली दुनिया. ये आभासी दुनिया बौद्धिक वर्ग के लिए किसी वरदान की तरह है.
यदि साहित्यकार अपने भाषा और संस्कृति को जीवित रखना चाहता है तो उसे दोनों तरह की दुनिया में प्रासंगिक होना पड़ेगा.
अंगिका साहित्य को आभासी दुनिया से जोड़ने का श्रेय जाता है कुंदन अमिताभ जी को.इन्होने ही सबसे पहले अंगिका.कॉम नाम की एक वेबसाइट बनायीं और अंगिका से जुडी पुरातन और नवीन सामग्रियों को प्रकाशित करना शुरू किया.
कुंदन अमिताभ के इस पहल का परिणाम यह हुआ की अंगिका साहित्य से जुड़े बड़े नामों में से एक डॉक्टर अमरेंद्र, राहुल शिवाय और ऐसे ही अनेक साहित्यकारों ने इस विधा की रचनाओं को फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर साझा करना शुरू किया.धीरे -धीरे फेसबुक पर अंगिका समाज बना और दर्ज़नों साहित्यकार अंगिका में कवितायेँ लिखने लगे. अंगिका पुनः जीवित होने लगी.
कोई भी भाषा विश्वपटल पर छा सकती है बस उसे कुछ समर्पित लोग मिल जाएँ. ऐसे ही एक समर्पित युवा साहित्यकार हैं राहुल शिवाय. फरवरी २०१६ में अंगिका भाषा को कविता कोष से जोड़ने का कार्य किया राहुल शिवाय ने. कविता कोष भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी वेबसाइट है. कविता कोष में शामिल होने से अंगिका भाषा को एक बड़ा मंच मिला. देखते ही देखते कविता कोष में २००० से अधिक रचनाएँ और १०० से ज्यादा रचनाकार शामिल हुए.अंगिका दिन प्रतिदिन प्रसिद्द होने लगी.
जिस भाषा को यूनेस्को ने विलुप्तप्राय कहा था वही भाषा एक बार पुनः प्रासंगिक हो उठी. यदि इसी तरह साहित्यकार इस भाषा के उत्थान के लिए दृढ संकल्पित रहे तो इस भाषा का राष्ट्रीय पटल पर आना निश्चित है.
लोक भाषा लोक संस्कृतियों को बाँध कर रखती हैं और यही लोक संस्कृतियां भारत की विशेषता रही हैं. इनके जीवित रहने से ही भारतीयता की पहचान है इसलिए इनका संरक्षण अनिवार्य है….
- अभिषेक शुक्ल
लोक भाषाएँ लोक संस्कृतिओं की संवाहक होती है.विभिन्न प्रकार की लोक भाषाएँ और लोक संस्कृतियां भारत की विभिन्नता में एकरूपता की अवधारणा को पुष्ट करती हैं.भारत की यही विशिष्टता है विभिन्नता में एकरूपता.इन्हीं लोक भाषाओँ में एक सुमुधर और चिर पुरातन भाषा है अंगिका.
अंगिका भाषा से मेरा परिचय अभी कुछ समय पूर्व ही हुआ है.मैं इस भाषा की विशिष्टता से अनभिज्ञ था. इसका एकमात्र कारण यह था कि अंगिका भाषा मैथिली भाषा के सामान ही प्रतीत होती है.दोनों भाषाओं में विभेद करना केवल उन्ही के सामर्थ्य की बात है जो या तो भाषाविद हैं अथवा जिनकी ये मातृ भाषा है.
आज के युग में हर भाषा अपनी विशिष्टता खो रही है. उदाहरणार्थ अवधी और भोजपुरी को ही देख लीजिए.अवधी कबीर, रहीम और तुलसी दास जी की भाषा रही है. एक से बढ़कर एक ग्रन्थ और दोहे इसमें रचे गए हैं.भारतीय जनमानस का सबसे प्रसिद्द ग्रन्थ “श्री राम चरित मानस ” भी अवधी में ही लिखा गया है.शायद ही कोई सनातन धर्मी हो जिसके घर में रामचरित मानस न मिले, किन्तु यह जिस भाषा में है उस भाषा को लोग भोजपुरी समझने लगे हैं. भोजपुरी हावी हो रही है अवधी पर क्योंकि उसे स्तरीय साहित्यकार नहीं मिल रहे हैं.संयोग से अंगिका भी इसी स्थिति से गुजर रही है.
अंगिका अंग प्रदेश की भाषा है. वही अंगराज कर्ण की भूमि.अंग प्रदेश सदैव से प्रासंगिक रहा है चाहे महाभारत काल की बात हो अथवा बुद्ध काल की। यह प्रदेश सदैव भारत राष्ट्र का गौरव रहा है, किन्तु यहाँ बोली जाने वाली भाषा अंगिका अपने अस्तित्त्व से संघर्ष कर रही है.
यूनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने तो इसे विलुप्त भाषाओं में चिन्हित किया है,इसका कारण एक मात्र यही है कि इस भाषा को अच्छे सृजक नहीं मिले.
अंगिका भाषा मिठास की भाषा है, ऐसी भाषा जो बहुत आसानी से सीखी जा सकती है.यूँ तो किसी भाषा का उत्थान या पतन उस भाषा को बोलने वालों की सामरिक आर्थिक,सामाजिक और वैयक्तिक क्षमता पर निर्भर करती है किन्तु कई बार कुछ समर्थ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो इन सभी परिस्थितियों की अभाव में भी अपनी भाषा और संस्कृति को आगे ले जा सकते हैं.
ऐसे ही कुछ समर्थ साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ जो अंगिका भाषा के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं.
आज बौद्धिक वर्ग एक ही दुनिया में दो तरह की दुनिया में खुद को जीता है. एक वास्तविक दुनिया और दूसरी आभासी दुनिया.
आभासी दुनिया अर्थात फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉग वाली दुनिया. ये आभासी दुनिया बौद्धिक वर्ग के लिए किसी वरदान की तरह है.
यदि साहित्यकार अपने भाषा और संस्कृति को जीवित रखना चाहता है तो उसे दोनों तरह की दुनिया में प्रासंगिक होना पड़ेगा.
अंगिका साहित्य को आभासी दुनिया से जोड़ने का श्रेय जाता है कुंदन अमिताभ जी को.इन्होने ही सबसे पहले अंगिका.कॉम नाम की एक वेबसाइट बनायीं और अंगिका से जुडी पुरातन और नवीन सामग्रियों को प्रकाशित करना शुरू किया.
कुंदन अमिताभ के इस पहल का परिणाम यह हुआ की अंगिका साहित्य से जुड़े बड़े नामों में से एक डॉक्टर अमरेंद्र, राहुल शिवाय और ऐसे ही अनेक साहित्यकारों ने इस विधा की रचनाओं को फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर साझा करना शुरू किया.धीरे -धीरे फेसबुक पर अंगिका समाज बना और दर्ज़नों साहित्यकार अंगिका में कवितायेँ लिखने लगे. अंगिका पुनः जीवित होने लगी.
कोई भी भाषा विश्वपटल पर छा सकती है बस उसे कुछ समर्पित लोग मिल जाएँ. ऐसे ही एक समर्पित युवा साहित्यकार हैं राहुल शिवाय. फरवरी २०१६ में अंगिका भाषा को कविता कोष से जोड़ने का कार्य किया राहुल शिवाय ने. कविता कोष भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी वेबसाइट है. कविता कोष में शामिल होने से अंगिका भाषा को एक बड़ा मंच मिला. देखते ही देखते कविता कोष में २००० से अधिक रचनाएँ और १०० से ज्यादा रचनाकार शामिल हुए.अंगिका दिन प्रतिदिन प्रसिद्द होने लगी.
जिस भाषा को यूनेस्को ने विलुप्तप्राय कहा था वही भाषा एक बार पुनः प्रासंगिक हो उठी. यदि इसी तरह साहित्यकार इस भाषा के उत्थान के लिए दृढ संकल्पित रहे तो इस भाषा का राष्ट्रीय पटल पर आना निश्चित है.
लोक भाषा लोक संस्कृतियों को बाँध कर रखती हैं और यही लोक संस्कृतियां भारत की विशेषता रही हैं. इनके जीवित रहने से ही भारतीयता की पहचान है इसलिए इनका संरक्षण अनिवार्य है….
- अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

उन हाथों में बर्तन है .

जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
बर्तन है
कैसे सबका कहना मानूँ दया जगत का
दर्शन है,
कुछ सपने मैंने भी देखे थे पढ़ने और
लिखने के
अब नसीब में मेरे केवल चौका,पोंछा
बर्तन है।
कुछ उम्मीदें दुनिया से हैं कुछ अधिकार
हमें भी दे दो,
सबको तो दुलराते रहते थोड़ा प्यार
हमें भी दे दो ,
मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता जो दुनिया
का दर्शन है ,
जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
                                                                         बर्तन है।                                                    -अभिषेक शुक्ल




फोटो क्रेडिट-समन्वय 

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

क्या लिखूँ??

क्या लिखूँ?? कुछ सूझ नहीं रहा है। कुछ दिनों से लिखना चाह रहा हूँ फिर भी नहीं लिख पा रहा। जब लिखने का मन होता है तब क्लास चलती है, क्लास के बाद लाइब्रेरी फिर मेट्रो। वहां धक्का-मुक्की में अंदर का साहित्यकार कभी राहुल सांकृत्यायन बनता है तो कभी निराला।इस चक्कर में अभिषेक कहीं खो सा जाता है। घर आता हूँ तो नींद जकड़ लेती है। पिछले कई दिनों से भीतर का कवि सो रहा है।
कभी लिखने-पढ़ने के मामले में अनियमित नहीं रहा, सोने से पहले एक-दो कविता,कहानी या आलेख लिखना आदत में शामिल रहा है। बचपन से ही पढ़ने-लिखने में मन लगता था। पाठ्यक्रम के विषय में नहीं,वे तो मुझे फूटी कौड़ी नहीं सुहाते थे। हां पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य विषयों में तो प्राण बसते थे मेरे।
कभी बूआ की किताब उठा कर भूगोल पढ़ता, तो कभी दीदी के अलमारी से विज्ञान। इन सबसे उबरता तो नंदन,चंपक,नन्हे सम्राट, कोबी-भेड़िया, नागराज,ध्रुव, और चाचा चौधरी को पढ़ने बैठ जाता था। कोर्स की किताबों को पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था।
सप्ताह में जब कभी भइया पढ़ाने बैठते थे तो मेरी पिटाई हो जाती थी। पढ़ने वाले विषयों का प्रवक्ता रहता था पर गणित में हाथ तंग थे।फिर जब भइया पुराने अभ्यास करने को देते थे कई बार मैं कर नहीं पाता था। फिर मेरी धुनाई हो जाती थी।
आठवीं कक्षा तक यही हाल रहा, इसके बाद पढ़ाई को लेकर मेरी दुर्भावना, सद्भावना में बदली और ठीक-ठाक विद्यार्थी हो गया।
भइया चाहते थे कि मैं सबसे अव्वल रहूँ, सबसे आगे रहूँ और मेरी समस्या रही कि मैं हमेशा धार के विपरीत बहा।
जो परिभाषाएं कक्षाओं में लिखवायी जाती थीं उन्हें कभी यथावत लिखा ही नहीं। बिना नई परिभाषा गढ़े मुझे पानी नहीं पचता था।इसी वजह से कभी मेरे बहुत अच्छे नम्बर नहीं आये।
मैं उन भाग्यशाली बच्चों में से एक हूँ जिनके अभिभावक बच्चों के परीक्षाओं में खराब प्रदर्शन पर उन्हें डांटते नहीं हैं बल्कि कहते हैं कि कोई ऐसी परिक्षा बनी ही नहीं जो तुम्हारी योग्यता का आकलन कर सके। तीन घंटे वाले आकलन को यथार्थ मानना सही नहीं है।
मैं भी खुश हो जाता इसीलिए पढ़ाई को कभी बोझ नहीं मान पाया। जब मन किया तब पढ़ा, जब खेलने का मन किया तो खेला। यहां तक कि परीक्षाओं में भी एक-दो कविता तो लिख लेता था।
आठवीं कक्षा तक आते-आते तो घर में सबको पता लग गया कि मैं लिखता हूं।
घर में लोग मेरी टूटी-फूटी कविताओं को पढ़कर खुश हो जाते, घर में जो आता वो मेरी डायरी जरूर पढ़ता।
बचपन से ही दर्शन मेरा प्रिय विषय रहा लिखने का, कारण कि बाबा को भारतीय दर्शन से विशेष प्रेम था, भइया और बाबा अक्सर शाम को दार्शनिक परिचर्चा करते रहते। मुझे उन्हें सुनना अच्छा लगता था।
फिर यही बातें मेरे साहित्य की नींव बनी। मैं दर्शन से आज तक उबर नहीं पाया हूँ।
मेरा एक साहित्यकार मित्र कहता है कि तुम आरंभ प्रेम से करते हो और समाप्त दर्शन पर करते हो।
दर्शन सबको पसंद नहीं आ सकता। दर्शन का एक सीमित दायरा है। मेरे साहित्यिक यात्रा की एक बड़ी बाधा मेरा ऐसा लिखना भी है।
एक गीत मैंने लिखा था वर्षों पहले गीत की पहली पंक्ति है -
प्रिय तुम मधु हो जीवन की
तुम बिन कैसी हो मधुशाला
जो तुम्हें तृप्त न कर पाए
किस काम की है ऐसी हाला?
और अंतिम पंक्तियां हैं -
व्यक्त,अव्यक्त या निर्गुण हो
इसका मुझको अनुमान नहीं,
मेरे बिन खोजे ही मिल जाना
तुम बिन मेरी पहचान नहीं।।
यहां मैं चाह रहा था कि प्रेम लिखूँ पर नहीं लिख पाया। भटकाव इसे ही कहते हैं।
मुझे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से अनन्य प्रेम है। क्लिष्टता तो और अधिक प्रिय है मुझे। जब मैं अपने लिए लिखता हूं तो ऐसा ही लिखता हूं।
मुझे कई बार टोका भी गया है। हिंदी के एक अध्यापक ने मुझे कहा कि तुम इतने क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग मत किया करो तुम्हें पढ़ेगा कौन?
मैंने कहा कि गुरुदेव आप! और कौन?
साहित्यकार बनने का मेरा रह-रह के मन करता है। चाहता हूं कि अपने भार से अधिक पुस्तकें लिखूँ। कलम का साथ कभी न छूटे।मैं चाहता हूं मेरे भी उलझन में दुनिया सुलझे।
( कवि हूं! मेरी उलझन में दुनिया सुलझा करती है - हरिवंश राय बच्चन)।
पर सच कहूं तो मेरा प्रयत्न इस दिशा में नगण्य है। मुझे लिखना नहीं आता। व्याकरण की समझ नहीं है। साहित्य में मुझसे अधिक उच्छृंखल शायद ही कोई हो। लयबद्ध कविताओं में भी छंद दोष कर बैठता हूं। छंदबद्ध कभी-कभी लिखता हूं। दोहे-चौपाई तो साल भर में एक-दो बार।
साहित्य समर्पण मांगता है।साहित्य के साधक तपस्विता के लिए विख्यात होते हैं। न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं। न जाने कौन सी आंखें होती हैं उनके पास जो हम सब में नहीं होती। जिन्हें हम देख नहीं सकते,जिन संवेदनाओं को हम अनुभूत नहीं कर पाते वे उन पर ग्रंथ लिख बैठते हैं।
सत्य ही कहा गया है कि संवेदनाएं मानव को महामानव बनाती हैं।यह साहित्य के लिए अपरिहार्य अवयव है। साहित्यकार अपनी बौद्धिकता से लोगों को सम्मोहित करता है, उन्हें तरह-तरह के भ्रम जाल में फंसाता है। कभी प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर ले जाता है तो कभी अवसाद की।
भइया कहते हैं कि- "अवसाद वही लिख सकता है जो स्वयं परम सुखी हो। क्योंकि अवसाद से घिरा व्यक्ति कभी सृजन नहीं कर सकता। मन की अकुलाहट कभी उससे कुछ रचनात्मक नहीं करा सकती।"
यह कथन कितना सही है यह नहीं जानता किंतु मैंने जिन साहित्यकारों का अवसाद पढ़ा है वे व्यक्तिगत स्तर पर परम फक्कड़ी रहे। उन्हें अवसाद हो ही नहीं सकता था।
साहित्य धर्मिता यही है की पर पीड़ा की भी वैसे ही अनुभूति हो जैसे उक्त परिस्थितियां स्वयं पर पड़ी हों। संवेदना इसे ही कहते हैं और यही साहित्य की आत्मा है।
काश मुझे भी लिखना आए, संवेदना उपजे, साहित्य को समझने की समझ विकसित हो। अभी तो अपने पथ से भटका हुआ हूं, कोई राह मिले तो जीवन सार्थक हो।
अभी तो बस इसी कशमकश में हूं, क्या लिखूँ??

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

देश नहीं कहता तुमसे

देश नहीं कहता तुमसे तुम राष्ट्रवाद के प्रेत बनो
सम्प्रभुता के बागी बनकर उग्रवाद की भेंट चढ़ो,
वाद विवाद से हो सकता जो शासन का निपटारा
तो संसद का अधिपति होता लोकतंत्र का हत्यारा,
हथियारों की भाषा केवल सीमित है सीमाओं पर
लेकिन घर में हुई बगावत क्या गुजरेगी माँओं पर?
कितनों को तुम खत्म करोगे बन्दूकों हथगोलों से
देखो धरती सिसक रही है भारत के मंगोलों से,
नक्सलियों की हिंसा से तो अक्सर दिल्ली कांपी है
दुनिया से तो लड़ बैठे अब किससे लड़ना बाकी है,
गीता जिन्हें निरर्थक लगती माओ जिनके प्यारे हैं
रुसो,माओ,कार्ल मार्क्स के दर्शन नहीं हमारे हैं??
शांति, अहिंसा,प्रेम, समन्वय भारत की पहचान है
अपने दर्शन और संस्कृति पर हमको अभिमान है,
भारत तेरे टुकड़े होंगे जिनका राष्ट्रीय गीत है
उग्रवाद के अग्रदूत से जिनको अतिशय प्रीत है,
उनसे एक निवेदन है कि भारत से प्रस्थान करें
आस-पास स्थान बहुत हैं वहीं जा के संधान करें,
वहां करोड़ों मिल जाएंगे भारत से जलने वाले
यू एस ए और चीन के टुकड़ों पर पलने वाले,
उग्रवाद के प्रबल समर्थक अक्सर हमले करते हैं
सीमाओं पर जिनकी ख़ातिर लाखों सैनिक मरते हैं,
शिक्षा के मंदिर में भारत को दफनाया जाता है
लोकतंत्र में लोकतंत्र को आग लगाया जाता है।।
हिंसा वाले दर्शन का अब तो उपचार जरूरी है
उग्रवाद के मूलभाव का भी संहार जरूरी है।।
ऐसे दंगे नहीं रुके तो देश कैसे चल पाएगा ??
अंगारों पर चलने से तो लोकतंत्र जल जाएगा।।
फिर बौद्धिकता को लेकर के बहस उठेगी देश में
कैसे भारतीयता जी सकती है ऐसे परिवेश में??
हिंदू-मुस्लिम बंट जाएंगे अपने-अपने खेमें में,
कैसे फिर हम गर्व करेंगे अपने भारतीय होने में?
- अभिषेक शुक्ल


शनिवार, 16 जुलाई 2016

मन बावला है।।



मन बावला है, मन बावला है
सोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।
मुझको ख़बर है कि
ख़्वाहिश हुई है
कुछ तो मोहब्बत सी
साज़िश हुई है
कोई है गुम-सुम
ख़्यालों मे ख़ुद के
लगता है चाहत की
बारिश हुई है...
मन बावला है,मन बावला है
सोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।
उसने कहा कुछ
मैंने सुना कुछ
सपने मे उसने
शायद बुना कुछ
फिर भी है गुम-सुम
ख़ुद में ही खोई
मिल के भी मुझसे
क्यों न कहा कुछ??
मन बावला है,मन बावला है
सोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।
अब तो मोहब्बत का
इज़हार कर दो
हो न मोहब्बत तो
इंकार कर दो
सब कुछ पता है
मासूम दिल को
ख़ुद को भी चाहत की
कुछ तो ख़बर दो।।
मन बावला है,मन बावला है
सोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।
-अभिषेक शुक्ल

शनिवार, 9 जुलाई 2016

जहां-जहां तक ये दृष्टि जाए वहां-वहां तक दिखेंगी राधा।।

भटक रहे हो मार्ग केशव! यहां से आगे
नहीं है राधा
मचा है मन में कैसा कलरव तुम्हारे
पथ में अनंत बाधा,
सहज से मन का मधुर सा भ्रम है कि तुम
सुपथ को कुपथ समझते
जहां-जहां तक ये दृष्टि जाए वहां-वहां
तक दिखेगी राधा।।
जो तुमको लगता है प्रेम सब कुछ तो प्रेम
सा कुछ नहीं है राधा
जगत का उपक्रम है योग केवल ये प्रेम
मानव के पथ की बाधा,
मैं मोक्ष लेकर भी क्या करुंगी मेरे तो
अधिपति हैं मेरे मोहन!
जो उनको ही मैं भूल बैठूं बताओ
कैसे रहूंगी राधा ??
- अभिषेक शुक्ल।।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

कहां गए घट-घट के वासी

पर्वत -पर्वत भटक रहा हूँ
हे शिव तुमको पाने को,
वन-वन भटका विहग बन रहा
द्वार तुम्हारे आने को,
किंतु तुम्हारे पग चिह्नों पर
श्वेत-श्वेत सा दिखता क्या है?
जो तुम ढ़क लेते हो खुद को
बोलो इससे मिलता क्या है??
पैर भले असमर्थ हो रहे
दृष्टि भले असहाय हुई है
लेकिन तुम तक आना मुझको
भक्ति नहीं निरुपाय हुई है
कहां छिपे घट-घट के वासी
कहां छिपी मेरे शिव की शिवता?
क्या वर्षों से नयन बन्द हैं
अथवा आई उनमें जड़ता?
पग-पग, डग-मग लिए कलश मैं
पर्वत पर नियमित बढ़ता हूं
मैं शिव की सीढ़ी चढ़ता हूं।।
-अभिषेक शुक्ल


शुक्रवार, 24 जून 2016

याद आएंगे दोस्त।




कल कालेज का आख़िरी दिन था आज। पांच साल कब बीते कुछ पता ही नहीं चला। मम्मी बिना मैं एक दिन भी नहीं रह पाता था लेकिन मेरठ में पांच साल बिता गए , बिना रोये, कुछ पता ही नहीं चला।
पता भी कैसे चलता मौसी जो पास में थीं। मौसा दीदी, हिमानी सब तो थे..घर की याद भी कैसे आती?
वीरू भइया और मैं ....पांच साल पहले घर से निकले थे जिस मकसद के लिए वो पूरा हो गया।
 भइया दुनिया के सबसे नेक इंसानों में से एक है। बहुत कुछ सीखा है भइया से। हां! मैं इस जन्म में मैं उनसे उऋण नहीं हो सकता।
कुछ बेहद प्यारे दोस्त मिले...
अंजली ,निखिल, निष्ठा,प्रियंका,विशाखा ,पूजा, सौरभ,सोनू  और एक अजूबा दोस्त...सुधांशु....इतने साल बीत गए साथ रहते हुए इसे भइया और मैं दोनों नहीं समझ पाये...किसी अलग ही ग्रह से आया है।
कुछ दोस्त और भी थे...जिन्होंने बीच में ही पढ़ाई ब्रेक कर दी, पर सबकी याद बहुत आएगी।
अंजली- will miss u 
निखिल - भाई! माना तेरी शक्ल एक ख़ास टाइप के  जीव से मिलती है लेकिन हरकतें भी वैसी ही  करना ठीक नहीं है।(हर चीज़ सूंघा मत कर यार)
निष्ठा- चशमिश wish u all d best.
प्रियंका- तेरे पास तो हर सवाल का जवाब होता है..कुछ भी बक देती है, जज बनने के बाद उल्टे-सीधे जजमेंट मत देना..किसी के life की लग जाएगी।
विशाखा- तुम तो बुद्धिमान हो...आज examiner मैम ने भी कह दिया।
पूजा- कुछ दिन और रुक जाती यार, तूने तो पहले ही बाय कर दिया।
सौरभ- गबरु जवान, मिलते रहना।
सोनू- भाई! शादी में बुलाना मत भूलना।
सुधांशु - तू तो हिंग्लिश आदमी है।।
Thank you दोस्तों...तुम सबका साथ बहुत प्यारा था....contact में रहना, और हां! मिलते रहना यार.....तुम सबकी बहुत याद आएगी।
याद आने से पहले याद कर लेना।
Love u all











सोमवार, 20 जून 2016

पापा कितना खुश होते हैं??

जब अखबारों में भूले-भटके नाम
मेरा आ जाता है
जब मेरा कोई लिखा हुआ गीत घर में
मिल जाता है
जब सूरज के जगने से पहले फोन मेरा
घर जाता है
पापा कितना खुश होते हैं??
दिन भर की भाग दौड़ से जब पापा
थक जाते हैं
मुकदमों की माथापच्ची छोड़ घर में
जब आते हैं
जब मम्मी अपने हाथों से चाय
बना कर लाती है
पापा कितना खुश होते हैं?

जब भइया अंग्रेजी में कोई गाना
गाता है
जब पापा के मित्रों को वो कानून
सिखाता है
जब सबको अपने बातों से वो चुप
सा कर देता है
पापा कितना खुश होते हैं?
जब अम्मा मोटर की सीटी सुनकर
बाहर आती है
पापा को सीढ़ी चढ़ते देख मन में
मुस्काती है
जब अम्मा आभार भरे नयनों से
शिवाला तकती है
पापा कितना खुश होते हैं?
जब हम पापा के बालों पे कोई
कलर लगाते हैं
पर पापा धीरे से भगने की कोई
जुगत लगाते हैं
जब हम पापा से रुकने की ज़िद
करने लगते हैं
पापा कितना खुश होते हैं?

मेरा सब कुछ मेरे पापा! मैं पापा का
खेल खिलौना,
दुनिया में सबसे प्यारा है मुझको
पापा का खुश होना।

(लव यू पापा)
-अभिषेक

शनिवार, 4 जून 2016

स्वभाव का विरूपण

अच्छाई विरूपता है और बुराई व्यक्ति का मूल स्वाभाव। अच्छाई सिखाई जाती है और बुराई जन्म से व्यक्ति में विद्यमान होती है। स्वाभाव से हर व्यक्ति उद्दण्ड होता है किन्तु विनम्रता ग्रहण या अनुकरण करने की विषय-वस्तु होती है।
विरूपता सीखी जाती है। वास्तव में किसी भी शिशु के व्यवहारिक विरूपण की प्रक्रिया उसके जन्म के समय से ही प्रारम्भ हो जाती है। परिवार के सभी सदस्य विरुपक होते हैं। सबका सामूहिक उद्देश्य होता है कि कैसे शिशु का आचरण मर्यादित हो,व्यवहारिक हो और बोधगम्य हो...ये सभी तत्त्व विरुपक तत्व हैं जिनको ग्रहण किया या कराया जाता है।


किसी नावजात शिशु को यदि समाज से पृथक रखा जाए और उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था से अनभिज्ञ रखा जाए(जैसे-सम्बन्ध,रिश्ते,भाषा,विज्ञान,प्रसन्न्ता,दुःख और व्यवहारिकता..इत्यादि) तो उसका स्वाभाव मानवीय आचरण के अनुरूप नहीं होगा। तब वह अपने मूल स्वाभाव में होगा। तब वह सृष्टि के आदिम छलावे से मुक्त होगा। जो होगा वही दिखेगा। उच्छश्रृंखल होगा और सभ्यता के आवरण को ओढ़ेगा भी नहीं।
फिर न उसे सम्मान का मोह होगा न अपमान का भय। वह इन सभी विरुपक तत्वों से भिन्न होगा।
किन्तु कहाँ इस जग को किसी भी व्यक्ति का मूल स्वाभाव स्वीकार्य होता है। सब विरूपता चाहते हैं। सब चाहते हैं कि व्यक्ति बदले। किन्तु क्यों बदले यह तर्क किसी के पास नहीं है।
मेरा एक मित्र है। बहुत सरल,सभ्य और संस्कारित है। विनम्रता उसकी विशिष्टता है। वह सबको अच्छा लगता है। एक दिन एक महाशय मिले। उन्हें उसमें भी
अनंत दोष दिखने लगे। उन्होंने मेरे मित्र के चरित्र-चित्रण में अपना जो बहुमूल्य समय गवांया उसमें उनके चिंतन का मुख्य बिन्दु केवल उसका सीधापन था। कहने लगे कि उसका सीधापन उसके प्रगति में बाधक है। उनके कहने का सार बस इतना सा था कि पागलपन और सीधापन एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं।
उनके कथनानुसार सीधा व्यक्ति समाज में जीवित रहने योग्य नहीं होता इस लिए चालाक बनो।
मेरे मित्र का मूल स्वाभाव उसकी सरलता है तो वह क्यों जटिल बने?क्यों कुटिलता सीखे? क्यों विरूपण स्वीकारे? यदि वह बदल भी जाये तो बदला हुआ रूप क्या उसके परिवार को स्वीकार होगा? क्या खुद को बदलकर वह अपने आपको झेल पाएगा?? जवाब शायद नहीं ही होगा।
एक मेरे परिचित हैं। बहुत चालाक हैं। उनकी चालाकी धूर्तता की सीमा लांघती है। बनावटी भाषा, और अभिनय देखकर चिढ़न भी होती है। कई बार बात करते हैं तो मैं अनसुना कर देता हूँ। कई बार बात भी नहीं सुनता बीच में ही उठकर चला जाता हूँ। उन्हें लगता है कि वो मुझे बेवकूफ़ बना रहे हैं और मैं बेवकूफ़ बन भी रहा हूँ।
मैं भी सोचता हूँ कि चलो भाई! ग़लतफ़हमी जरूरी है..उन्हें इसी में आनंद मिलता है तो ईश्वर करे सतत् इसी कार्य में वो लगे रहें...हाँ! अलग बात है कि महाशय दीन-प्रतिदिन अपना विश्वास खोते जा रहे हैं। कई बार जब वे सच बोलते हैं लेकिन मुझे विश्वास ही नहीं होता उनके किसी भी बात पर।
अगर ये महाशय तनिक सी विरूपता सीखें और सरल स्वाभाव के हो जाएं तो इन्हें सब विश्वास  और सम्मान की दृष्टि से देखेंगे...पर निःसंदेह उनका सरल होना उनके मूल स्वभाव को और बनावटी बना देगा।
तात्पर्य यह कि आप जैसे हैं वैसे ही रहिये। किसी के कहने पर मत बदलिए, लोगों की सुनेंगे तो सब आपको अपने हितों के अनुसार बदलने को कहेंगे।
किसी के लिए बदलना अपराध है। बदलाव तभी आ सकता है जब आपको लगे कि आप अव्यवहरिक हो रहे हैं। बदलाव अपने प्रकृति के अनुसार अपने आप में लाइये...ऐसा परिवर्तन जिसे आपका ह्रदय स्वीकार कर सके वह आपका मूल स्वाभाव होगा किन्तु यदि इससे इतर आप कोई परिवर्तन आप स्वयं में लाना चाहते हैं तो वह विशुद्ध विरूपण होगा।
विरूपित व्यक्तित्त्व को मन स्वीकार कर नहीं पाता।
पुष्प की शोभा केवल तभी तक है कि जबतक वह अपनी शाखा से संयुग्मित है, जैसे ही शाखा से विलगन होता है वह सूख जाती है...उसके विग्रह का विरूपण उसे स्वीकार नहीं होता और वह सूख जाता है....यही स्थिति व्यक्ति के साथ है। जब किसी को परिवर्तन के लिए बाध्य किया जाता है तब उसके स्वभाव में परिवर्तन नितांत कुण्ठा ही होती है।
 जो जैसा है वैसा ही रहे.....बाध्यकारी परिवर्तन विरूपण है....अनैसर्गिक है....और जो नैसर्गिक नहीं है वह अपनाने योग्य नहीं है....

- अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 24 मई 2016

तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई

प्रीत के मन्त्र सारे धरे रह गए
गीत आंसू बने नीर से बह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
गीत जितने लिखे सब तुम्हारे लिए
रात दिन हम तुम्हें गुनगुनाते रहे
चुप रहो मौन! हो विश्व ने यह कहा
सारे आघात सह तुमको गाते रहे
मन की पीड़ा सभी से छिपाते रहे
अश्रु मधुमय हुए पर खरे रह गए
गीत अधरों पे मेरे धरे रह गए
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
प्रीत तुमसे लगी जग ये विस्मृत हुआ
तृप्ति मुझको मिली मन ये हर्षित हुआ,
प्रेयसी तुम समझ से परे ही रही
चेतना त्यागकर मन समर्पित हुआ
किंतु तुम तो मलय सी विचरने लगी
हम हिमालय के जैसे खड़े रह गए
 कामना ने कहा,भावना ने किया
प्रीत कर हम ठगे के ठगे रह गए
हम निर्झर थे निर्झर बने रह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 13 मई 2016

पीढ़ियों का टकराव।




पिढ़ियों का टकराव होना स्वाभाविक है। अलग-अलग काल,खण्ड और परिवेश के लोग जब एक ही छत के नीचे रहते हों और सबको अपने-अपने युग की धार में बहने की आदत हो तो परस्पर अर्न्तद्वन्द्व का होना स्वाभाविक है।
कभी-कभी वैचारिक समता के आभाव में सम्बन्धों में कटुता जन्म लेती है जिससे एक-दूसरे के प्रति केवल ऐसी अवधारणा उपजती है जो परिवार को विखण्न की ओर ले जाती है।
युवता की अलग ही धार होती है। होनी  भी चाहिए क्योंकि जो अपने युवा काल में स्वच्छंद नहीं रहा वह प्रौढ़ होकर भी स्वतंत्र निर्णय लेने से डरता है। उच्छश्रृंखलता कभी-कभी शुभ फल देने वाली होती है।
किसी भी पिता कभी भी यह इच्छा नहीं होती है कि पुत्र साहसी बने।यदि कोई अपने पिता के वचनों का अक्षरशः पालन करे तो वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। हर बात मानी ही नहीं जाती और पिता को भी यह समझना चाहिए कि हर बात मनवाई नहीं जाती।
युवा ऐसी मन:स्थिति  है जिसमें व्यक्ति स्वाभाव से ही क्रांतिकारी होता है। क्रांतिकारी नहीं विद्रोही सही शब्द है। परम्परा रुढ़ि लगती है,सीख स्वीकार्य नहीं होती है। ऐसी स्थिति में जो युवा करे उसे वही सही लगता है। सही लगना भी चाहिए। मैं उस व्यक्ति का धुर विरोधी हूं जिसकी यह धारणा होती है कि दूसरों की असफलताओं से सीखो। क्यों भाई? अपनी सफलता स्वीकार है असफलता नहीं? बचपन से बताया जाता है कि आग छूओगे तो जलोगे, पानी में गहरे उतरोगे तो डूबोगे। मैं किसी और के जलने का अनुभव क्यों लू्ं? मुझे जलना भी खुद है और डूबना भी।
युवता से प्रौढ़ता की प्रत्याशा रखना किसी महापाप से कम नहीं है। किसी भी सोच को पुष्ट होने में समय लगता है। गम्भीरता एक उम्र के बाद स्वत: ही आती है ऐसे में किसी के अल्हड़पन को अवगुण समझना नैतिक अपराध है।
कोई मुझसे ये प्रत्याशा रक्खे कि में महत्वपूर्ण विषयों पर अपने पिता की भाँति वैचारिक दृढ़ता दिखाऊँगा तो यह कहाँ सम्भव है? मैं समस्याओं का समाधान अपने पिता की भाँति कुशलतापूर्वक कर ले जाऊँगा यदि ऐसा कोई सोचता है तो केवल उसका मुझपर अटूट विश्वास ही होगा अन्यथा मैं स्वयं को इतना सक्षम नहीं समझता कि मैं ऐसा कुछ कर पाऊंगा।
गम्भीरता,कुशलता,वैचारिक दृढ़ता और व्यवहारिकता अनुभव से आती है। जो कम उम्र में किसी ईश्वरीय प्रसाद से ही आ सकती है।
बच्चों में जो प्रतिभा है उसे निखारा जाना सही है या जो उनमें दोष है उन पर सामूहिक परिचर्चा करना?? अच्छाई किसी को भी बुराई से दूर कर सकती है, बेहतर होगा कि अच्छाई की इतनी प्रशंसा हो कि बच्चा कुछ बुरा करते डरने लगे ,उसे लगने लगे कि उसके इस कृत्य से उसकी छवि धूमिल हो सकती है।
हर मां बाप को अपने बच्चों से शिकायत होती है। कोई किसी की अपेक्षाओं पे खरा नहीं उतरता। मुझसे भी मेरे अभिभावकों को शिकायतें होंगी। मेरे पढ़ाई को लेकर, व्यवहार को लेकर, मैं कोशिश करता हूं कि सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतरूँ, पर नहीं हो पाता मुझसे। अब इसे लेकर मुझमें कुण्ठा हो या मेरे अभिभावकों को तो क्या यह उचित होगा?
अभिभावक अपने बच्चों में कुण्ठा न पनपने दें और बच्चे अपने अभिभावकों को कुण्ठित न होने दें तो परिवार खुशहाल रह सकता है अन्यथा एक-दूसरे की कमियां देखने में परिवार कलह की भेंट चढ़ जाएगा और खुशियाँ चौखट पर आकर भी लौट जाएंगी, फिर पूरे परिवार में एक खास प्रकार का सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा,दर्शन का.....कभी दोष दर्शन तो कभी दरिद्र दर्शन।
ये दोनों स्थितियां घातक हैं, ये दोनों दर्शन घातक हैं बेहतर है इनसे बचा जाए, खुशियाँ तलाशनी पड़ती हैं, समेटनी पड़ती हैं, लेकिन आप को रोना ही अच्छा लगे तो आपको ईश्वर सदबुद्धि दें।
( प्रकाशित, दैनिक जागरण,२०/०५/२०१६)
-अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 10 मई 2016

एक तुम्हारे लिए!!



मुक्ति के द्वार पर दासता को लिए
प्रार्थना कर रहे
मित्र तुम किस लिए?
स्वर्ग से भी परे मोक्ष के मार्ग पर
अर्चना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
कंठ अवरूद्ध है
ईश क्यों क्रुद्ध है?
मन मेरा कह रहा
तन कहां बुद्ध है??
सांसों को त्यागकर वर्जना पार कर
साधना कर रहे
मित्र तुम किस लिए?
रुढ़ियां तोड़ कर सर्जना छोड़कर
याचना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
भावना गौण है
गर्जना मौन है
तुम बिना हे सखे!
अब व्यथित कौन है??
स्नेह का त्याग कर गेह परित्याग कर
कल्पना कर रहे
मित्र तुम किस लिए??
नित्य अह्वान कर प्रीत का गान कर
अल्पना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
-अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 3 मई 2016

ध्वस्त धर्मध्वज

तोड़ दिया मैंने खाली पड़े
 खण्डहरों को
ध्वस्त इमारतों को
धर्मध्वजों को
क्योंकि
सब निष्प्रयोज्य थे;
गौरवशाली अतीत देखकर
अहंकार हो रहा था मुझे
किंतु
वर्तमान उन्माद की भेंट
चढ़ जाता था,
सनातन,चिरंतन, अद्वितीय
संस्कृति का स्वांग
धूमिल कर देता था
मेरे जीवन के प्रत्येक क्षण को,
आज! अद्भुत आह्लाद है
ह्रदय में
मिट्टी को मिट्टी में मिलाकर;
लाल,केसरिया,हरा,सफेद
ध्वजों को
रंग दिया मैंने एक रंग में
तोड़ दिया उन सभी स्तम्भों को जिनमें
लहरा रहे थे
परस्पर विद्वेष के कारक,
अब न कोई कोलाहल है
न ही अंर्तद्वन्द्व
एक शाश्वत शांति है
दशो दिशाओं में
दूर कहीं सुनाई पड़ रही है
रणभेरी
दासता पर स्वच्छंदता के
विजयनाद की।।
-अभिषेक

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

आत्ममुग्धता

आत्मप्रशंसा, आत्मश्लाघा और आत्ममुग्धता जीवन के अपरिहार्य अवयव हैं। इन तीनों तत्वों के अभाव में अवसाद जन्म लेता है, जो व्यक्ति को जीवित शव बनाता है।
 जैसे शक्तिहीन शिव शव के सामान हैं वैसे ही इन तत्वों के अभाव में व्यक्ति शव है।
 वह व्यक्ति निष्प्राण है जो इन तत्वों से विरत है।
 आत्मप्रशंसा हमें कई जघन्य कृत्यों से विलगित करता है। इससे हम प्रायः दूसरों की आलोचना, अनुशंसा और निंदा से बच जाते हैं। निंदा चाहे अपनी हो या अपनों की हो केवल विषाद को जन्म देती है। निंदा परिणामहीन पथ है जिस पर चलकर केवल वैमनस्य जन्म लेता है। वैमनस्य जहाँ भी जन्म लेता है वहाँ विनाश होता है…बुद्धि का सम्पूर्ण ह्रास होता है।
 जब हम आत्मप्रशंसा की राह थामते हैं तो इस महापाप से स्वतः बच जाते हैं अतः
 आत्मप्रशंसा अनिवार्य है।
 आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा से तनिक पृथक है। आत्मश्लाघा में व्यक्ति अपने सद्भावपूर्ण कृत्यों की प्रशंसा करता है। आपसे अनभिज्ञता में अथवा संज्ञान में कोई भी ऐसा सत्कर्म हो जाए जो समाज के लिए हितकर हो, अनुकरणीय हो तो उसे प्रचारित और प्रकाशित अवश्य करें…ऐसा करना नारायण की सहायता करने जैसा है।
 आत्ममुग्धता; संसार का श्रेष्ठतम तप है। आत्ममुग्धता तो परमतत्व को प्राप्त करने का साधन है। जब तक आप स्वयं से प्रेम करना नहीं सीखते आप प्रेम जानते ही नहीं। जो स्वयं से प्रेम करता है वह विश्व से प्रेम करता है। व्यक्तिवाद से ऊपर उठ अध्यात्मवाद की ओर चलता है, जहाँ न कोई जड़ है न कोई चेतन है।
 विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उनकी पहली और अंतिम साधना आत्ममुग्धता रही है। आत्ममुग्धता हीन भावना से नहीं उपजती, श्रेष्ठ कर्मों से उपजती है। कर्म ही कर्म को आकर्षित कर सकता है इसके लिए कर्मठ बनना पड़ता है…आत्ममुग्धता तब जन्म लेती है। स्मरण रहे आत्ममुग्धता अहंकार से पृथक तत्त्व है।
” एकोहम् द्वितीयो नास्ति न भूतो न भविष्यतिः” अहंकार है आत्ममुग्धता नहीं। अहं भाव तो सब दुखों का कारण है, यह ऐसी मनोवृत्ति है जिसका कोई उपचार नहीं है। जिसमे लेशमात्र भी यह गुण है वह मानव होते हुए भी अमानव है…उसके व्यथा का भी यही एक मात्र कारण है।
 जब व्यक्ति आत्ममुग्धता की ओर अग्रसर होता है तो उसका प्रतिद्वंदी ही नहीं रहता, यह व्यक्ति की सर्वोत्तम अवस्था होती है।
 आत्मप्रशंसा,आत्मश्लाघा और आत्ममुग्धता तीनों को पृथक न देखने पर एक ही भाव मन में उपजता है जिसे “प्रेम” कहा जाता है। प्रेम चाहे संसार के प्रति हो या स्वयं के प्रति प्रेम-प्रेम होता है। प्रेम का अर्थ ही कल्याण होता है।
 यह मानव का स्वभाव ही है कि वह बहुत शीघ्र निष्कर्ष तक पहुँच जाता है, भले ही निष्कर्ष कल्पित हो।
 अपने गुणों को(खूबियों को) संसार के सामने प्रकट करो, दुर्गुण (खामियां) तो संसार स्वतः खोज लेता है।
 मुझमे अनंत दोष हैं और दुर्गुण भी, यदि अपने दुर्गुणों को मैं सबसे बताता चलूँ तो मैं उनका प्रचार कर रहा हूँ उन्हें प्रोत्साहित कर रहा हूँ। हो सकता है किसी का मैं आदर्श हूँ, हो सकता है कोई मुझसे प्रभावित हो यदि वह मेरे अवगुणों को जानेगा तो उन्हें अपना सकता है क्योंकि प्रायः यही देखा गया है कि अवगुण, गुणों की अपेक्षा अधिक आकर्षक होते हैं…यदि मैं अपने अवगुण सबके सामने प्रकट करूँ तो ये किस तरह का कृत्य होगा?
यदि मैं सद् गुण को, अपने कला को संसार के सामने प्रकट करूँ तो हो सकता है कोई मार्ग से भटका व्यक्ति पुनः सन्मार्ग पर आ जाये।
 मानवता तो यही कहती है न कि सत्कर्मों को विश्व में फैलाओ…..कुकर्मों को नहीं।
 किसी महान विभूति ने कहा है कि “जब-तक हम अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर गर्व करना नहीं सीखते तब-तक हमारे जीवन में किसी बड़ी उपलब्धि का प्रस्फुटन नहीं होता।” गर्व करो…पर अहंकार युक्त नहीं आत्ममुग्धता युक्त।
 प्रयत्न तो यह हो कि अवगुणों से पृथक रहो उन्हें स्वयं पर हावी मत होने दो, दबा दो किन्तु यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो अवगुणों पर पर्दा डालो…उनसे मुक्त होने का प्रयत्न करो…अवगुणों का अधिवक्ता न बनो। उन्हें सुरक्षित रखना मेरे मति से महापाप है और जान-बूझ कर पाप करना उचित कैसे हो सकता है?
अपनी खूबियों को संसार के सामने लाओ बुराइयां तो लोग खुद ही ढूंढ लेंगे।
 पुरुष स्वाभाव से ही व्यभिचारी होता है, कुछ को अवसर मिलता है कुछ व्यभिचार न कर पाने की कुंठा में जीते हैं, कुछ अवसर तलाशते हैं और कुछ सदाचार से व्यभिचार को अस्तित्वहीन करते किंतु यह खामी हर इंसान में होती है तो क्या इसकी वकालत करते चलें? इसे सुरक्षा दें?
ऐसा करना सर्वथा अनुचित है।
 अपनी खामियों की चर्चा मत करो…उन्हें ख़त्म हो जाने दो…मिट जाने दो…तुम्हारी अच्छाइयों से दुनिया का और तुम्हारा भला होगा बुराइयों से नहीं।
 अपने खामियों की चर्चा करना वीरता नहीं भीरुता है..इतनी कमज़ोरी क्यों की अपने ही मनोदशा पर नियंत्रण न रहे?
जब माँ भारती के प्रांगण में जन्म ले ही लिया है जहाँ परोपकार संस्कार में मिलता है…वहाँ बिना सत्कर्मों का बीज बोए पलायन करना उचित तो नहीं?
आओ! इस जीवन यज्ञ में शुभ कर्मों का सन्धान करें….संसार को सन्मार्ग पर प्रेरित करें…भले ही हमारा यह प्रयत्न अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो…किन्तु अस्तित्वहीन तो न होगा?
 (मेरे भैया की कलम से .)

लेखक-
अनुराग
 अधिवक्ता,
चैम्बर नंबर २३,सिद्धार्थ बार एसोसिएशन
 सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश.

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

बौद्धिकता से परे भारतीय राजनीति

किसी भी विकासशील राष्ट्र के मूल समस्या में उस देश के धार्मिक,सांप्रदायिक अथवा जातीय विभेदों के नाम पर होने वाले संघर्ष शामिल नहीं होते न ही ऐसे विषय राष्ट्रीय चिंतन का केंद्र बिंदु बनने योग्य होते हैं किन्तु संयोग से भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय चिंतन के ये एकमात्र केंद्रबिंदु बन गए हैं.”असहिष्णुता, अमानवीयता और असंवेदनशीलता पूरे विश्व में समापन की ओर है किन्तु भारत में उत्थान की ओर” यह एक आम धारणा बन गयी है लगभग-लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों की जिनके मतभेद भारतीय जनता पार्टी से हैं.भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक दलों के नेताओं के बयान भी ऐसे अर्थहीन और अप्रासंगिक होते हैं जिनका उल्लेख करना भी किसी शिक्षित व्यक्ति की बौद्धिकता पर सवाल उठा सकता है.
कभी-कभी लगता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी ने लोगों को इतना अमर्यादित कर दिया है कि इस अधिकार के सामने देश की एकता और अखंडता की कोई कीमत नहीं रह गयी है.अभिव्यक्ति के नाम पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंडियन आर्मी मुर्दाबाद, और कश्मीर की आज़ादी तक जंग जारी रहेगी ‘ जैसे जुमले क्षमा योग्य हैं क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्र सबको मिली हुई है. वाह क्या अधिकार है अभिव्यक्ति का अधिकार भी. जिस राष्ट्र द्वारा संचालित विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उसी राष्ट्र कि गरिमा को तार-तार किया जा रहा है ऐसी सहिष्णुता विश्व में कहाँ मिलेगी?
देश का एक बड़ा तबका प्रगतिवादी सोच की भेंट चढ़ रहा है. ये प्रगतिवादी आचरण से नहीं हैं अपितु सोच से हैं. प्रगतिवाद की परिभाषा इन्होने नयी बनायीं है. प्रगतिवाद के दायरे में क्या-क्या आता है यह भी उल्लेखनीय है, जैसे- देश को गाली देना,सत्तारूढ़ सरकार को गाली देना, भारत मुर्दाबाद के नारे लगाना, महिषासुर जयंती मनाना, अफ़ज़ल,कसाब और याकूब की बरसी मनाना, तिरंगा फाड़ना ये सब प्रगतिवाद है.
भारत में विचारधाराओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़-छाड होती है. यहाँ हर महान व्यक्तित्त्व के नाम को भुनाया जाता है.हर विचारधारा पर चलने का एकमात्र उद्देश्य राजनीती की रोटी सेंकनी होती है.राजनीतिक पार्टियां और इन पार्टियों के नेताओं का एकमात्र उद्देश्य जनता के बीच मतभेद कराकर वोट बैंक तैयार करना है.जनता भी फायदेमंद खेती है, नफरत बो कर मलाई काटी जाती है.
रोहित वेमुला के आत्महत्या का जिस तरह से तमाशा खड़ा किया गया की जैसे लग रहा था सभी राजनीतिक पार्टियों में करुणा,दया, वात्सल्य और वीभत्स रस प्रदर्शित करने का दौर चल पड़ा हो. सभी संवेदनशील हो गए थे रोहित के लिए.कितनी असीम संवेदना उस मासूम के लिए सबके ह्रदय में थी. कोई पागल व्यक्ति भी इन राजनीतिक पार्टियों के ढोंग को भांप लेता पर भारतीय जनता और मिडिया दोनों को इन सबकी आदत बन गयी है. एक के आँख पर तो पट्टी पड़ी है और एक को तो हर न्यूज़ में मसाला मार के अपनी टी.आर.पी बढ़ानी है.
आत्महत्या पर प्राइम शो चलने का क्या मतलब होता है? आत्महत्या का भी विज्ञापन? लोगों में जीने की जिजीविषा पैदा करना साहित्यकारों,पत्रकारों का काम है पर ये लोग आत्महंता से भी सहानभूति रखने लगे? रोहित की मौत को सही ठहराने लगे..कैसी बौद्धिकता है इस देश की?
विदेशी दर्शन और विदेशी विचारकों से प्रभावित होना भारतियों की एक और विशेषता है.कुछ अच्छी चीज़ें सीखें या न सीखें बुरी चीज़ें पहले सीख लेते हैं. भारत में प्रगतिवादियों के कुछ ख़ास चेहरे हैं जिनके पदचिन्हों पर चलना एक ख़ास बौद्धिक वर्ग को अधिक अभीप्सित है. उन चेहरों के नाम हैं- ”कार्ल मार्क्स, लेनिन,रूसो और माओत्से तुंग”.
ये सारे चेहरे परिस्थितिजन्य थे और अब ये कहीं से भी किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए प्रासंगिक नहीं रहे हैं.इनके रास्तों पे चलकर गृहयुद्ध,कलह और अराजकता के अतिरिक्त और कुछ हासिल नहीं किया जा सकता.जिन देशों में इन चेहरों का जन्म हुआ वहीँ ये विचारधाराएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं किंतु भारत में जूठन ढ़ोने की परंपरा रही है.
क्या चीन की मासूम जनता माओवाद से मुक्ति नहीं चाहती? क्या उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं चाहिए? क्या अभिजात्यवर्ग के सशन की अपेक्षा लोकतंत्र जनता को नहीं प्रिय होगा? हाँ! प्रिय है किन्तु जिन विचारधारों को भारतीय प्रगतिवादी ओढ़ रहे हैं उन्ही से चीन की मासूम जनता मुक्ति चाहती है. लेकिन भारतीय मार्क्सवादियों को ये कब समझ में आएगा…उन्हें तो बस अंधानुकरण की आदत है.
कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी मिले जिन्होंने ‘शहीद भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद’ तक को कम्युनिस्ट बता दिया.शायद उन्हें राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद के बीच का अंतर नहीं पता है.
जे.एन.यू में जो कुछ भी हुआ या एन.आई.टी.श्रीनगर में जो किया गया क्या यह भारतियों के मूल भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है? हाय! अब पाकिस्तान भी रहने योग्य हो गया…जय हो बौद्धिक आतंकवाद की.
इन दिनों भारतीय राजनीति में जो उथल-पुथल मची है उसे देख कर लग रहा है कि बहस के विषय बड़े संकीर्ण हो गए हैं.किसी को भी मुद्दों पर बात नहीं करनी है केवल बकवास पर सारा ध्यान केंद्रियत करना है.
किसी भी पार्टी या न्यूज़ चैनल वालों के बहस का विषय गरीबी,बेरोजगारी, भूखमरी, बीमारी, भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि मोहन भागवत, आदित्यनाथ, ओवैसी या दो चार और चिरकुट नेताओं ने क्या बयान दिए, कौन भारत माँ की जय नहीं बोला , कौन बोल रहा है या कौन नहीं बोलेगा? ये बहस का विषय है.
आज जितनी भटकी शैली मे मैंने लिखा है उससे कहीं ज्यादा भटकी भारतीय राजनीति है .राजनीती इतनी गन्दी हो गयी है कि सत्तापक्ष का विरोध करना विपक्ष का मौलिक कर्तव्य और विपक्ष की आलोचना करना सत्तारूढ़ पार्टी का मूल कर्तव्य हो गया है. इस तरह की विचारधारों से यदि देश बहार नहीं निकलता है तो भारत का भविष्य कभी भी स्वच्छ लोकतंत्र की ओर नहीं बढ़ सकता.
इन परिस्थितियों से उबरने के लिए जनता और मिडिया दोनों को पहल करनी होगी.जो ख़बरें धार्मिक,जातीय,सांप्रदायिक तनाव पैदा करें उनका प्रसारण न किया जाए.देश में और भी कई समस्याएं हैं उनपर ध्यान केंद्रित करना अधिक उचित होगा अपेक्षाकृत ”किसने क्या कहा?” इस पर शो बनाने से.
जनता को भी समझदारी दिखानी चाहिए की देश धर्म,जाती या संप्रदाय से परे होता है,यदि सब साथ मिलकर नहीं चलेंगे तो बिखर जाएंगे, फिर जो लोग इस देश के उज्जवल भविष्य का सपना लिए शहीद हुए उन्हें अपने बलिदान पर पश्चाताप होने लगेगा….कृतघ्न नहीं कृतज्ञ बनिए और संवैधानिक मूल्यों पर चल कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कीजिये…यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना हँसते-हँसते मौत को गले लगा लिया..आपके लिए..हमारे लिए..अपने सपनों के भारत के लिए…
जय हिन्द…वन्दे मातरम!
(दैनिक जागरण में सम्पादकीय पृष्ठ पर आज प्रकाशित)



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

करूँ मैं नयनों से अभिषेक

सखे! क्या स्मृति तुमको शेष
खुले थे स्वतः तुम्हारे केश
किया हमने एकांत में बात
आह वह संकल्पों की रात,
अरे वह गगन सुता का दृश्य
और उसमें स्वर्णिम सी नाव
प्रकाशित अन्तःमन का कक्ष
ब्रम्ह का अद्भुत अकथ प्रभाव,
बढे हम तीर्थाटन की ओर
नहीं लाख पाये कोई छोर
कहाँ थी दिशा कोई भी ज्ञात
तुम्हारी हर लीला अज्ञात
नहीं था कोई भी उद्देश्य
नहीं अनुमानित कोई विधेय
विश्व ने घोषित किया प्रमेय
सखे! तुम मानव से अज्ञेय,
एक सागर जो है तटहीन
सकल ब्रम्हांड उसी में लीन
वहीं पर कहा प्रणय के गीत
मित्र तुम पर अर्पित संगीत,
स्वरों का कौतूहल आह्लाद
लहरों में अद्भुत उठा प्रमाद
ध्वनित होती मधुरिम झंकार
मिला संसार का नीरव प्यार
तरंगों की गतियां उत्ताल
मूढ़मति होने लगा निहाल,
शब्दों के बंधन से उन्मुक्त
भावना स्वतः हुई अभियुक्त
सकल ब्रम्हाण्ड यदि हुआ सुप्त
स्वप्न का समय नहीं उपयुक्त,
सहसा मन को मिली फटकार
अभी तो हिय में शेष विकार
यदि कर्तव्य कर्म हों शेष
जीव को मिलता नहीं प्रवेश
द्वीप से मुड़े स्वतः ही पांव
नयनों से ओझल हुआ वो गांव,
छाने लगी उषा चिर काल
विश्व में व्यापित मायाजाल
खग-विहग लौटे अपने द्वीप
आने लगी निशा ज्यों समीप
जाने किसने फेंका था पाश
हुआ मति का मेरे अवकाश
और सम्यक दृष्टि से हीन
अहं में हुआ मेरा मन लीन,
यही पथ की बाधा थी मित्र!
धूमिल हुआ तुम्हारा चित्र,
नयनों पे कुहरे का है प्रभाव
कहीं तो भटक रही है नाव
नाव में हुआ है ऐसा छेद
डुबोता मेरे मन के भेद,
सुझाओ मुझको ऐसी राह
नाव को मिलती रहे प्रवाह,
विचरण करूँ सदा स्वछन्द
कभी न गति मेरी हो मंद,
मुझे बस वही दिशा मिल जाए
जहाँ दर्शन तेरा मिल जाए
कामना जहाँ गौण हो जाए
कौतूहल जहाँ मौन हो जाए,
अभीप्सित मुझे वही स्थान
जहाँ अवलोकित हों भगवान,
मेरी इच्छा है केवल एक
करूँ मैं नयनों से ''अभिषेक''।।
-अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 23 मार्च 2016

होली है


कितना भी तुम छिप लो राधा
तुम्हे रंगने आऊंगा
बरसाने से वृन्दावन तक तुमको
मैं दौड़ाऊँगा,
चाहे तुम कितना भी छिप लो रंग बिरंगी गलियों में
तुमको अपने प्रीत के रंग में भीतर तक रंग जाऊंगा।।
तुमसे न डरती हूँ कान्हा! तुम न मुझे
रँग पाओगे,
अपने रँग दिखा दूँ तुमको तो मुझसे
डर जाओगे,
चढ़ा हुआ है रँग प्यार का मेरे तो
मन मंदिर में
रँग-बिरंगी राधा को तुम कहाँ भला
रँग पाओगे??
- आप सबको अभिषेक की ओर से होली की बहुत-बहुत बधाई

गुरुवार, 17 मार्च 2016

बरस रहा है यूँ प्यार तेरा...

बरस रहा है यूँ प्यार तेरा कि जैसे आँखों में उमड़ा बादल
तरस रही हैं मेरी निगाहें तेरी ही ख़ातिर हुआ मैं पागल,
दीवाना तेरा हुआ हूँ जब से नहीं लगे मन किसी जगह पे
जो दिन ढले तो तू याद आये जो शाम हो तो तेरी वो पायल
कि जिसकी छन-छन में डूबा तन-मन
कि जिसकी आहट से नींद टूटे,
कहां है गुम-सुम वो प्यार तेरा किया था जिसने जिया को कायल
बहकते क़दमों ज़रा तो ठहरो हुआ है ख़्वाबों से इश्क़ मुझको,
न पीछे पड़ना, न संग चलना, न राह तकना न होना घायल।।

-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

भरत ने कही ह्रदय की बात




भरत ने कही ह्रदय की बात
चलो तुम आज अयोध्या तात,
अभी तो तनिक शेष है रात
तात! तुम स्वयं नवल प्रभात।।
नहीं कुछ कैकयी का दोष
कहाँ नारी को इतना होश
सकुचित हुआ ह्रदय का कोष
परमति प्रकट हुआ था रोष।।
मन्थरा का था मलिन प्रभाव
दे दिया अविनाशी सा घाव
न जाने कैसा था वह ताव
किया जो अधम दिशा को पांव।।


प्रसंग बताइये?
😊😊😊😊😊😊
(पूरा कुछ दिन बाद लिखूंगा)
-अभिषेक

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कागज़


किताबों के दफ़्तर में रंगीन कागज़
रौशन है दुनिया जहाँ इनकी आमद,
सीखते ये दुनिया को सारे नज़ाकत
इन कागजों में गज़ब है हिमाकत।
इन्हीं काग़ज़ों से है रंगीन दुनिया
ये न हों तो लगती है संगीन दुनिया ,
ये हों तो मीठी है नमकीन दुनिया
ये न हों तो लगती है ग़मगीन दुनिया।
कहीं काग़ज़ों से है बिगड़ी तबियत
कहीं काग़ज़ों से हुई फिर फ़ज़ीहत,
कहीं काग़ज़ों से है गुमसुम अक़ीदत
कहीं काग़ज़ों से मिली फिर नसीहत।
कहीं काग़ज़ों में बनी है कहानी
कहीं कागजों की सुनी है जुबानी,
कहीं काग़ज़ों में हैं रस्में निभानी
कहीं काग़ज़ों में है उलझी जवानी।
-अभिषेक शुक्ल
(एक छोटी सी कोशिश कागज़ पर )

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

मेरी आँखों में उतरी 😊😊



मेरी आँखों में उतरी इश्क़ की ऐसी
वीरानी है
कि जैसे तुमको पाने की मेरी चाहत
पुरानी है !!
सुचिता के तूलिका से....

शनिवार, 30 जनवरी 2016

सुख का पेड़


कभी-कभी सोचता हूँ एक पेड़ लगाऊं सुख का और ईश्वर से वरदान मांगूं की जैसे -जैसे समय बढ़ता जाये वैसे -वैसे सुख का पेड़ और सघन हो जाये और एक दिन वह पेड़ इतना सघन हो जाये की समूचा आकाश भी उसे ढकने के लिए छोटा पड़ जाये. एक ऐसा पेड़ रोपूँ की जिसकी सघनता सुख का विस्तार करे ,समय जिसे जीर्ण न कर सके वरन समय भी उसके समृद्ध शाखाओं को को देख नतमस्तक हो जाये और सुख की छाँव में समय भी सुखी हो जाये.

मैं वर्षों से प्रयत्नशील हूँ कि सुख वृक्ष आरोपित करने के हेतु किन्तु इसका बीज कहीं मिला नहीं.
मुझसे पहले मेरे कई पूर्वजों ने सुख का पेड़ रोपना चाहा पर रोप न सके. संभवतः “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का अलाप उन्ही प्रयत्नों को सार्थक करने हेतु था किन्तु न जाने कैसा व्यवधान आन पड़ा कि वे विरत हो गए इस वृक्ष का बीज बोन से.
मेरे आदि पूर्वज मनु ने जब समाज की संकल्पना की,संस्कारों की बीज रोपा तभी उनसे एक भूल हो गयी थी .उन्होंने तभी सुख का भी बीज रोपा था जिसके लिए विधाता ने उन्हें वर दिया था. उन्होंने समाज, संस्कार,वर्ण की श्रृष्टि की किन्तु सुख का पेड़ रोप कर उसे सींचना भूल गए.समाज विस्तृत होता गया और सुख का पेड़ क्षीण होता रहा और धीरे-धीरे समय के साथ विलुप्त हो गया.
हमारे ऋषियों,मुनियों ने इस पेड़ को पुनः जीवित करने के लिए असंख्य मंत्र रचे, आह्वान किये,नए सूत्र दिए किन्तु समाज में मानवों ने स्वयं को अनेक ऐसे सघन वृक्षों की छाँव में घिरा पाया कि उनका ध्यान ही “सुख के पेड़” की ओर नहीं गया और यह पेड़ उपेक्षित होकर सूख गया.
लोभ, घृणा,ईर्ष्या,क्रोध,वितृष्णा, व्यभिचार आदि के इतने वृक्ष उगे कि “सुख का पेड़” उनमे कहीं खो गया. इन वृक्षों कि छाया इतनी सघन थी कि आनंद, उल्लास,सुख के पेड़ सूखते चले गए.
आह! मानव की तन्द्रा कभी टूटती ही नहीं है इन वृक्षों की छाया इतनी सघन हो गयी है कि लगता है मानव चिर निद्रा में सो गया है किसी कुत्सित वृक्ष के तले, जीवन की सुधि भूले…जड़वत..चेतना रहित…….मरणासन्न.