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रविवार, 4 अक्तूबर 2015

ए-दिल! इश्क़ की राहों में


फिर तबीयत बिगड़ रही है ए-दिल! इश्क़ की
राहों में
फिर मेरा दिल तड़प रहा है रात कट रही
आहों में,
फिर सुलगी है इक चिंगारी फिर दिल तेरे
पनाहों में,
फिर तू दौड़ी-दौड़ी आजा कोरी-कोरी
बाँहों में
(wonderful
painting by my sister himani)

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (05-10-2015) को "ममता के बदलते अर्थ" (चर्चा अंक-2119) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कविता और चित्र दोनों बहुत सुंदर है. बधाई अभिषेक और हिमानी.

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  3. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena69.blogspot.in/

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  4. वाह, बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति। अभिषेक जी मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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  5. जितना सुंदर चित्र है उतनी सुंदर रचना ।

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