शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

प्रकृति के रंग

प्रकृति! तुझमें कितने रंग है,कितने जीवित
दृश्यों का संकलन है तेरा स्वरूप? कितनी
विविधता है तुझमें,कितना नैसर्गिक आनंद है
तेरा दर्शक बनने में।

कौन सी कूची है तेरे पास ? कहाँ से लाती है तू
इतने रंग जिन्हें गिना नहीं जा सकता....कोई
चित्रकार क्या तुझे बनाएगा.....तेरा
चित्रकार तो बैठा है किसी पर्वत पर, किसी
नाग की शैय्या पर, किसी कमल पर...जिसने
तुझे रच तो दिया....सजीव तो किया पर छिप
गया कहीं।
पर कहाँ तक बचता? उस कलाकार ने मानव
बनाया और मानव ने ढूंढ लिया अपने रचयिता
को,अभिव्यक्त किया अपनी कृतज्ञता कभी
शब्दों से तो कभी विराट कैनवास पर तो
कभी रंगमंच पर।
सोचता हूँ कि मैं चित्रकार क्यों नहीं हूँ?
क्यों नहीं उकेर पाता मैं छवि उन
कलाकृतियों की जिन पर प्रकृति मौन रही,
जो दृश्य छिपे रहे चित्रकारों से। मन कहता है
कि कूची उठा लूँ, खोज लूँ कोई कैनवास
विशालतम प्रकृति में।
मैं चित्रकार कभी नहीं था, मेरी
रचनात्मकता बस शब्दों तक सीमित रही
किन्तु शब्द तो स्वाभाव से ही अपूर्ण हैं। कभी
व्याकरण की तो कभी शिष्टाचार की
सीमाओं में जकड़े हुए; हलंत, प्रत्यय, उपसर्ग,
अलंकार और न जाने कितने अनिवार्य नियमों
के पालन करने को बाध्य, आडम्बरों की
दासता में तड़पते शब्द।
विधाता के कृत्या (यह कृत्य से पृथक है) को
कौन अभिव्यक्त कर सकता है चित्रकार के
अतिरिक्त? शब्द शिल्पी असहाय है इस दशा
में।
अभिव्यक्ति के लिए शब्द पर्याप्त नहीं होते,
शब्द सीमित हैं क्योंकि इन्हें मानव ने बनाया
है अपनी सूझ-बूझ से,
किन्तु कला सम्पूर्ण है, कला ईश्वर है।
प्रकृति के वे दृश्य जिन्हें शब्द जानते ही नहीं,
क्या वर्णित करेंगे?
किसी पर्वत पर कोई अभिसारिका बैठी हो
किसी किसी कल्पना में गुमसुम सी, किसी
महर्षि की ब्रम्ह से मौन वार्तालाप जहाँ न
शब्दों की आवश्यकता हो न ही अभिव्यक्ति
की, किसी माँ का वात्सल्य, या गंगा की
अविरल धरा क्या शब्दों से व्यक्त हो सकी है
कभी?
कौन शब्द शिल्पी है जो शब्दों में संवेदना भर
दे?
शब्दों की एक सीमा है न?
किन्तु
चित्रकार एक कूची उठाता है और मानवीय
कल्पना से परे शिवत्व की ऐसी छवि बनाता है
जिसे मानव पूजता है। पत्थरों को काटकर
उसमे संवेदना भरता है, निर्जीव को सजीव
बनाता है। कभी-कभी अखरता है कि मैं,
चित्रकार क्यों नहीं? कलम छोड़ कुछ सूझता
ही नहीं, न कोई दृश्य न अभिसारिका न
अभिनय, न शाश्वत कला...शब्द अपूर्ण हैं न?

12 टिप्‍पणियां:

  1. हनुमान जयन्ती की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार (05-04-2015) को "प्रकृति के रंग-मनुहार वाले दिन" { चर्चा - 1938 } पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. प्राकृति को सृजक है ... वही निर्माण है वही विनाश है ...
    सुन्दर रचना है अभिषेक जी ...

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  3. प्रकृति के रंग बहुत ही शानदार रचना के रूप में प्रस्‍तुत हुई है। बधाई और धन्‍यवाद।

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  4. सोचता हूँ कि मैं चित्रकार क्यों नहीं हूँ?
    क्यों नहीं उकेर पाता मैं छवि उन
    कलाकृतियों की जिन पर प्रकृति मौन रही,
    जो दृश्य छिपे रहे चित्रकारों से। मन कहता है
    कि कूची उठा लूँ, खोज लूँ कोई कैनवास
    विशालतम प्रकृति में।
    मैं चित्रकार कभी नहीं था, मेरी
    रचनात्मकता बस शब्दों तक सीमित रही
    किन्तु शब्द तो स्वाभाव से ही अपूर्ण हैं। कभी
    व्याकरण की तो कभी शिष्टाचार की
    सीमाओं में जकड़े हुए; हलंत, प्रत्यय, उपसर्ग,
    अलंकार और न जाने कितने अनिवार्य नियमों
    के पालन करने को बाध्य, आडम्बरों की
    दासता में तड़पते शब्द।
    मन की अकुलाहटों को सुन्दर शब्द दिए हैं आपने मित्रवर अभिषेक जी

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  5. प्रकृति के रंगों के आगे इंसानी रंग फीके हैं ...बहुत सुन्दर

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