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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बचपन और राष्ट्र का भविष्य (बिलखता बचपन...उलझते सपने)


पूरे विश्व की लगभग एक तिहाई जनसंख्या उन बच्चों की है जिनकी आयु एक वर्ष से चौदह वर्ष तक के बीच की है। एक तिहाई जनसंख्या ऐसी है जिसे प्रत्यक्ष रूप से अपने अभिभावकों के आश्रित हो जीवन सीखना है। बचपन उम्र का ऐसा पड़ाव जहाँ से व्यक्ति के भविष्य का निर्धारण होता है; उनका सम्पूर्ण विकास, उनके सोचने का स्तर, बुद्धिमत्ता के  निर्माण का प्रारंभ इसी अवस्था में होता है।
घर ,प्ले स्कूल और स्कूल ये सारी जगहें तो इनके सीखने के लिए ही तो होती हैं। हर अभिभावक, माता-पिता का स्वप्न होता है कि उनके बच्चों का सर्वांगीण विकास हो ताकि बड़े होकर कामयाब इंसान बने और माँ-बाप का नाम रौशन करें। स्कूल कुछ और नहीं इसी स्वप्न को साकार करने का साधन है। यह शिक्षा ही तो है जो विकसित व्यक्तित्व को खाद पानी देती है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य वहां के भावी कर्णधार(बच्चों) पर टिका होता है। बच्चे तो भविष्य निर्माता होते हैं  किन्तु यही भविष्य जब सड़कों पर भीख मंगाते मिलें, कैंटीन में बर्तन धुलते मिलें या सड़क पर कूड़ा बिटोरते मिलें तो भविष्य से कैसी प्रत्याशा हो? क्या अनुमान लगाएं हम राष्ट्र और उनके भविष्य को लेकर? मासूमों बच्चों को कूड़ा-करकट साफ़ करने की मशीन समझें, कैंटीन में बर्तन धुलने की मशीन समझें या फुटपाथ पर सोने वाले माँ-बाप के लिए ए.टी.एम मशीन जो भीख मांग कर अपने घर की खर्ची चलाते हैं?
देश की एक बड़ी आबादी जिनके बच्चे स्कूल का मुँह तक नहीं देख पाते, स्कूल होता क्या है जिन्हें बिलकुल भी नहीं पता है।
ऐसी क्या मूलभूत कमी है जिसकी वजह से सरकार के इतने व्यापक नीतियों के बाद भी मासूमों के साथ केवल और केवल उत्पीड़न हो रहा है?
शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें तक नहीं पूरी हो पाती हैं, कहीं न कहीं ये हमारे खोखले तंत्र की उपज हैं जिसका गिरना तय है। अब तो उम्मीद करना ही बेकार है की इन बच्चों के भी कभी अच्छे दिन आएंगे।
सरकार को पता नहीं क्यों एहसास नहीं है कि जब जनता की बुनियादी जरूरतें नहीं पूरी होती हैं विद्रोह तभी होता है, प्रजातान्त्रिक देश में विद्रोह का सीधा अर्थ बंटवारा होता है, क्या हम सोच लें या मानसिक रूप से विभाजन के लिए तैयार रहें? अशिक्षित और शोषित वर्ग को भड़काना बहुत आसान काम है; हमारे कमजोरी का लाभ लेने के लिए हमारे पडोसी इच्छुक हैं..एक बार का विभाजन आज तक हम झेल रहे हैं अब और विभाजन कैसी झेल पाएंगे...काश सरकार को ये समझ जाये और सर्व शिक्षा अभियान को और अधिक उदार करे, भारत के भविष्य को एक सकारात्मक और ऊर्जावान राह दिखाए।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. भारत सरकार ने १४ वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा का कानून बनाकर रखा है परन्तु शिक्षा का निजीकरण ने उसको पंगु बना दिया है और यह केवल कागज़ी कानून बनकर रह गया है !
    : पेशावर का काण्ड

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  3. कटु सत्य को बताते हुए बहुत ही गहरी बात कही है अपनी इस प्रस्तुति में।

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  4. इसके लिये आवश्यक है सरकारी स्कूलों में स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था। और जगह जगह मोबाइल स्कूलों का प्रसार प्रचार।

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  5. गंभीर विचारणीय प्रस्तुति
    सरकार को आंकड़ों से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत देखने की जरुरत है लेकिन सबकुछ देखते हुए भी वे सत्ता सुख में इतने तलीन हो जाते हैं ५ साल यूँ ही गुजर जाते हैं ....

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  6. सत्य को बताते हुए बहुत ही गहरी बात कही है प्रस्तुति में।

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